Thursday, June 3, 2021

सोनभद्र प्राचीन प्रथम भाग

 

                     सोनभद्र प्राचीन

   (स्वतंत्रता पूर्व के सोनभद्र का एतिहासिक अध्ययन)                   रामनाथ शिवेन्द्र

              समर्पण

 पूज्य स्व. पिता प्रभुनारायण सिंह जी को,

जो कहा करते थे...‘खूब लिखो,

पेट काट कर लिखो, घर बेच कर लिखो,

पर ऐसा लिखो।

जिससे वर्तमान के मुर्दा शब्द भविष्य

में जीवित हो उठें

         इतिहास के साथ चलते हुए

 ‘वे सभ्य हेैं,इसलिए हमारे यहां आयेंगे

सभ्य से सभ्यतर बन जायें इसलिए

हमे उजाड़ देंगे

मैने पूछा था विजयगढ़ किले की

खंडहराती दीवारों से कृकृकृ

पार्टनर तुम उजड़ क्यों गये

तुम पुरातत्व ही नहीं इतिहास भी हो

इतिहास उजड़ता नहीं

कुछ पागलों को छोड़ो

वे कहते है इतिहास उजड़ चुका है

हँसते हुए दीवारों ने बताया था

यह मुझसे नहीं वर्तमान से पूछो

जो मुंह फुलाये बैठा है

अतीत बनने के लिए

                 प्रस्तावना

आइए अतीत के साथ चलें पर कैसे?

अतीत में उतरना आसान सहज तो नहीं

सोनभद्र का अतीत कैसा था? यह सवाल जितना चौकाऊं तथा रहस्यमय है उतना ही आवश्यक भी। अतीत का भविष्योन्मुख होना अतीत की तार्किक गतिशीलता पर निर्भर है। जाहिर है जड़ एवं जाहिल अतीत तो भूत में सार्थक रहता है, ही वर्तमान में उल्लेखनीय, ही उसमें ऐसे कारक हेाते हैं जो भविष्यकी जरूरी भूमिका को निर्धारित करते हैं। सोनभद्र का अतीत सिन्धु-घाटी की सभ्यता, मोसोपोटामिया की सभ्यता,आर्यो की गतिशीलता, मुगलों राजपूतों की हमलावर संस्कृति ठाट-बाट या अंग्रेजों की कुटिल साम्राज्यवादी प्रवृत्तियों के आधार पर देखने से यह कत्तई भ्रम नहीं रह जाता कि यहॉ का मध्यम वर्गीय या निम्नवर्गीय समाज उन कथित इतिहास के स्वर्ण-कालों में भी काफी बुरी हालत में छटपटाते हुए अपनी मृत्यु की प्रतिक्षा में ही रहा है। सत्ता-संस्कृति अपने भिन्न-भिन्न रूपों में हर काल में लगभग एक ही तरह की रही है। हर सत्ता का साझा लक्ष्य जनता की अभिव्यक्तियों का दमन करते हुए शान्ति-व्यवस्था सुनिश्चित करने णका रहा है। शान्ति-व्यवस्था की स्थापना के लिए सत्ता या सत्ता-समूहों द्वारा जिन-जिन उपायों को विधि-सम्मत या समाज-सम्मत बनाया जाता था, वे उपाय अपने मूल रूप में कमकर जनता या गरीब श्रमजीवी जनता समूहों के लिए घृणित दर्जे तक घृणित होते थे फलस्वरूप सचेतन श्रमजीवी-सामाजिक समूहों का पशु-जीवन में बदल जाना या बदलते जाना नियति बन जाती थी।

अतीत का शक्तिशाली समाज, सत्ता-समाज का रूप स्वयंभू तरीके से हासिल कर लेता था। सामान्य समाज का सत्ता-समाज में रूपान्तरण किसी चमत्कारी या दैवी-कृपाओं के आधार पर नहीं होता था। सत्ता-समाज में रूपान्तरण के लिए शक्ति सम्पन्नता आवश्यक हुआ करती थी। वैदिक-काल पुराण-काल की सत्ता-संस्कृति भी शक्ति के विभिन्न श्रोतों की केन्द्रीयता की ही रही है। शक्ति के विभिन्न साधनों-संसाधनों की विभिन्न निर्मितियॉ इस तथ्य का स्पष्ट रूप से खुलासा करती हैं कि हमला एवं हत्या दो ऐसी कार्यवाहियों थीं जिससे साबित होता था कि कौन विजेता है तथा कौन विजित। सोनभद्र की सीमा तथा मीरजापुर की विन्ध्य पहाड़ियों के अन्तर्गत  पुरामानवों द्वारा ढूॅढे गण आवासीय ठिकानों गुफाओं का अन्वेषणकर्ताओं ने पता लगाया है। उन गुफाओं के भीतर उकेरित चित्रों तथा वहॉ पाए गए पत्थरों के औजारों से यह साफ-साफ पता चलता है कि पुरा-मानव अपनी सुरक्षा के लिए सचेतन रूप से काफी चिन्तित था। पुरामानवों की सुरक्षा चिन्ताओं ने ही उन्हें इस लायक बनाया था कि वे हथियारों का निर्माण कर सकंे। चूंकि पुरामानवों की दुनिया

इक्कीसवीं सदी के लिए कल्पनीतीत थी। उनके सामने केवल प्रकृति थी तथा वे खुद भी प्रकृति के किसी दूसरे उत्पाद की तरह थे। मानव होने के कारण वे इस हद तक समझदार भी थे कि अपनी सुरक्षा के बावत सोच सकें क्योंकि उन पुरामानवों के सामने घनघोर जंगल था, जंगली जीव-जन्तुओं का बहुसंख्यक शक्तिशाली आक्रामक समूह था। पुरामानव अपने सदृश्य मानवों की सुरक्षा एवं भोजन के लिए पशु-वध को जरूरी समझता तथा उसके लिए भिन्न-भिन्न किस्म के हथियारों का आविष्कार करता तब शायद मानव जाति का आज इतना सर्व-ज्ञानी, सर्व-शाक्तिशाली होना मुश्किल हो जाता। मानव जाति की खुद पर आत्म-मुग्ध होने वाली आज की दुनिया संभवतः होती।

पुरा-मानव की खोजांे तथा उनके रहन-सहन के तौर तरीकों से यह स्पष्ट हो जाता है कि मनुष्य, बुद्धिमत्ता के क्षेत्रा मेें एक ऐसा प्राकृतिक उत्पाद है जो निरन्तर सक्रिय, गतिशील, परिवर्तन-कामी रहा है। पुरामानव यदि आज की तरह संवेदन-शीलता की प्रति तटस्थ या जड़ रहा होता तो शायद अतीत ही आज का वर्तमान होता जैसा कि आज भी सोचने विचारने वाले कथित बौद्धिक समूहों के लोग अतीत को महिमामण्डित करते हुए उसे पुनर्जीवित करने के प्रयासांे में सांसंे फुला रहे हैं। सांसें फुलाने वालों की सांसे इसलिए नहीं फूल रही हैं कि हमारे पुरखे (आदिमानव) प्रकृति के स्पष्ट उत्पाद थे (बिना घाल-मेल) तथा जंगल ही उनका लोक था, जीवन था। जंगल से वे भूख मिटाते थे तो जंगल से ही जीते रहने का उत्साह भी पाते थे। इन्हीं पुरखों के वनांचल में दण्डकारण्य की संस्कृति का भी विकास होता है। आर्य-समूहों के आगमन तथा उनके युद्धों की सारी कथाएं जो जीत-हार के इतिहास का निर्माण करती हैं, सबके सब वनांचल के दण्डकारण्य में ही घटित होती हैं। इतिहास ज्यों-ज्यों काल का भेद करता गया त्यों-त्यों बीते कालांे पर कालिख चढ़ाता गया। दण्डकारण्य के लोक का कालगत विलोपीकरण इतिहास की गतिशीलता का निर्णायक तत्व बनता गया तथा इसी विलोपीकरण की प्रक्रिया ने समाज को सभ्य एवं असभ्य, शिष्ट तथा अशिष्ट, जंगली एवं नागर समूहों में विख्ंाडित भी किया। अभिजात्य एवं नागर समूहों ने खुद को दण्डकारण्य संस्कृति से अलगियाते हुए अपने को कुछ विशेष श्रेणी में स्थापित कर लिया।

श्रम एवं संघर्ष की दण्डकारण्य संस्कृति जो श्रम एवं संघर्ष के फलस्वरूप उपजे विवेक के प्रयोगों में गति पकड़ रही थी तथा तत्कालीन परिस्थितियों में समायोजित होने के लिए ज्ञान तकनीक के अन्वेषण में लगी थी, ऐसे समूहों को हासिए पर धकेलते हुए नागर समूहों ने श्रम एवं संघर्ष के बजाय, परोपजीविता, शोषण, दमन एवं अत्याचार के बल पर शक्ति के श्रोतों का केन्द्रीकरण करना शुरू कर दिया। हमारे पुरखों के सामाजिक, राजनीतिक ऐतिहासिक क्षेत्रों में इस प्रकार से अवसरवादी मध्य-वर्ग अभिजनों का प्रवेश हुआ। यह तथ्य सर्वमान्य है कि मानव का प्रकृति के साथ हर काल में द्वन्दात्मक रिश्ता रहा है। इसी खास एवं विवेक सम्मत रिश्ते ने मानव को प्रकृति के साथ सदैव संघर्षशील रहने के लिए निर्देशित किया। इसे काल की या इतिहास की गतिशीलता भी कहा जा सकता है।

प्रकृति की विडम्बनाएं मनुष्य को सदैव अचम्भित करती रही हैं। मौसम के करतब सूरज की धूप, चांद की चांदनी, वनस्पतियों, जीवों आदि के विकास विनाश क्रम ये सभी मनुष्य के लिए विचारने के पृष्ठभूमि थे। विवेकी मनुष्य जो प्रकृति का सबसे बेहतर उत्पाद है, प्रकृति के दूसरे उत्पादों से किस तरह नाता जोड़े, उसके सामने यह बहुत बड़ा सवाल था सो वह निरन्तर संघर्ष-शील रहते हुए ज्ञान, विज्ञान के क्षेत्रा में विकसित होता चला गया। प्रकृति का अपनी आवश्यकताओं के मुताबिक अनुकूलन मानव ने श्रम एवं संघर्ष के माध्यम से ही सीखा। क्यांेकि आदिम युग शस्त्रों या शास्त्रों दोनों का नहीं था। वह युग उद्धरणहीन था वहॉ पूर्ववतीं कुछ था। वहॉ सिर्फ वर्तमान था तथा भविष्य की आकांक्षाएं थी।

आदिमकाल में मानव प्रकृति की स्वाभाविक/अस्वाभाविक उपलब्धियांे के उपयोगों के प्रति अपने विवेक की सीमा तक खड़ा था तथा कदम-कदम पर वह निर्णय कर रहा था कि प्रकृति का उपयोग अपने जीवन के क्रम में कितना कर सकता था। प्रकृति की प्रत्यक्ष उपयोगिता के कारकों ने ही मानव को श्रमशील एवं संघर्षशील बनाया। यही मूलरूप से मानव की प्रकृति को समझने तथा उपयोग करने का शुरूआती काल भी था। मानव एवं प्रकृति की इसी द्वन्दात्मकता ने मनुष्य के लिए आवास, ईधन एवं खाद्य सामग्रियों का अन्वेषण कराया। शिकार, खेती आदि की परम्पराएं तथा पत्थरों के हथियार निर्माण एवं आवास निर्माण की पुरातन कलाएं मानव ने प्रकृति के संघर्ष से ही सीखा।

आदिम काल की सामाजिक संरचना पर विचार करने से मालूम होता है कि वह काल बौद्धिक प्रतिद्वन्दिता के अकेले उपयोग का काल नहीं था। श्रम एवं संघर्ष के दौरान आदिम काल के मानवों में बौद्धिक कुटिलता ही नहीं सकती थी। श्रम का संयोजन हमेशा समाजगत एवं समूहगत ही रहा है। श्रम के भिन्न-भिन्न उपयोगों का व्यक्तिगत हितों के लिए इस्तेमाल, यह कुटिल बौद्धिक प्रपंच है। इतना ही नहीं यही बौद्धिक प्रपंच श्रम एवं संघर्ष के क्षेत्रों में प्रतिद्वन्दिता खड़ा कर व्यक्ति को दैवीय बनाने का काम भी करता है। आदिम काल से ही बौद्धिक प्रपंचों का सिलसिला प्रारंभ हो चुका था जिसका सामाजिक स्तर पर कबीलांे की संरचना में हम एक ढांचा पाते हैं। श्रम एवं पवित्रा संघर्ष की कार्यवाहियों का कबीलाई रूप बौद्धिक प्रपंचांे द्वारा नियेाजित प्रथम विभाजन था जिसमें मूलरूप से सामाजिक सहभागिता के भाव का संकुचन हुआ तथास्वका बोध आया। आदिमकाल में मानवी प्रवृत्तियों ने व्यक्ति को समष्टि से अलगिया कर  उसे इतना सीमित एवं कुटिल बनाया कि वह अपना कबीला के भावों से ओत-प्रोत होने लगा बाद में चल कर यह वैयक्तिक भाव अपना देश एवं अपना घर अपना परिवार तक जाकर संकुचित हो गया। समाज की सामूहिकता की संरचना में वैयक्तिकता के प्रतिद्वन्दिता का काल भी था।

 

        पुरामानव, औजार एवं पुरातात्विक सन्दर्भ

 

सोनभद्र की धरती पर पुरामानवों की उपस्थिति रही है जिसे अंग्रेज अन्वेषकों ने भी ईमानदारी से स्वीकारा है। उनके द्वारा ऐतिहासिक तथ्यों के स्वीकार या अस्वीकार किए जाने का मुद्दा इतिहास लेखन के मामलों में बहस का विषय बना हुआ है। सोनभद्र या कि मीरजापुर के बारे में बहुत कुछ पुराने गजेटियरों से मालूम होता है तथा दूसरा श्रोत विभिन्न रजवाड़ों के इतिहासों का विश्लेषण है। सोनभद्र का आदिम काल तो पुरातात्विक साक्ष्यों से ही स्पष्ट हो जाता है। यहॉ गुफाओं का पाया जाना उनमें चित्रों का उकेरित होना तथा भूमि-परीक्षणों के परिणामों का यहां जीवन होने के पक्ष में जाना, यह सब आदिम काल की तरफ ही संकेत देते हैं।

ज्ञान-विज्ञान तकनीक के सारे क्षेत्रों की जड़ें पुरामानव काल में ही उगने लगी थीं। ऐसा नहीं था कि पुरामानव अपने विवेक, तर्क समझ के मामलों में कहीं अवचेतन में था। तत्कालीन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वह पुरामानव काल में भी काफी चिंतित था। हॉ उसके सामने आज की दुनिया की कोई तस्वीर थी, तस्वीर के सिर्फ दो ही हिस्से थे, एक वह खुद था तथा दूसरी प्रकृति थी। प्रकृति का दोहन करना तो कथित विकसित मानवों ने प्रारंभ किया। पुरामानव तो जरूरतों के हिसाब से ही प्रकृति को छेड़ता था।

पाषाण-युग में मानव इतना कुशल हो चुका था कि वह हथियार बना सकता था तथा उस पर यकीन भी कर सकता था कि वह अपनी सुरक्षा वन्य जीवों या हमलावरों से कर सकता है। पाषाण-कालीन औजार सोनभद्र में भी पाए गए हैं। अचरज के रूप में यह था कि कुल्हाड़ी कहीं भी नहीं पाई गई, जब कि उस काल का मानव खेती-बारी करने के लिए जंगल काट कर खेत बनाना सीख चुका था। इस मुद्दे पर यह सवाल उठ सकता है कि क्या सोनभद्र की सभ्यता पाषाण-कालीन नहीं है? क्योंकि सोनभद्र में कहीं भी ऐसे औजार नहीं पाए गए जो किसी भी तरह से कुल्हाड़ी के समरूप हों। गजेटियर एवं अन्य किताबों में भी कुल्हाड़ी का उल्लेख नहीं मिलता।

पाषाण-काल से लेकर अंग्रेजों के काल तक सोनभद्र, शासन पद्धति, संस्कृति, परंपरा, सभी क्षेत्रों में अजीब रहा है। कभी तो यह पूर्ण रूप से स्वतंत्रा तथा आत्मनिर्भर था तो कभी कन्नौज तो कभी बनारस जैसी बड़ी रियासतों के अधीन भी। यह काल गत विडम्बना थी। मुगलों, पठानों एवं अंग्रेजों के आपसी साजिशी युद्धांे के दौर में कभी यह क्षेत्रा अकबर के अधीन चला जाता है तो कभी शेरश्शाह सूरी या जौनपुर के शासकों के अधीन। बनारस के अधपति की मीरजापुर एवं सोनभद्र पर तो बहुत ही नाटकीय एवं दमनकारी राज-व्यवस्था रही है। बनारसी हुकूमत के दौर में ही यहॉ पर अंग्रेजी सेनायें कुचक्र रचती हैं।

सोनभद्र के अन्तर्गत ऐतिहासिक रूप से जिन-जिन सत्ता-प्रणालियों का पता चलता है वे बहुत मायनों में देश में चल रहे युद्धों एवं हमलावर संस्कृतियों से कतई भिन्न नहीं रही हैं, उनमें समानता के तत्व अधिक थे। अधिकतम लगान वसूली का मुद्दा प्राथमिकता पर था। लगान वसूली के बावत किया जाने वाला प्रबंध-तंत्रा उदारवादी तो कत्तई नहीं था उसमें अमानवीय क्रूरता बर्बरता थी।

अकबर शेरशाह के जमाने की लगान वसूली व्यवस्था भूमि-प्रबंधन अंग्रेज बनारस के राजा द्वारा पूर्ण रूप से विकट लुटेरी बना दी जाती है। कमोवेश लगान की वृद्धि करना सभी हुकूमतों की प्राथमिकता थी। जाहिर है लगान वसूली के प्रबंध-तंत्र सेे हुकूमतों के चरित्रा का पता चलता है।

लगान वसूली लगान का निर्धारण करने का सारा तौर तरीका जनता की इच्छाओं एवं उनकी देय-क्षमता के विरूद्ध था। लेकिन वर्वरता के कारण जन-विद्रोह जैसी अभिव्यक्तियों का उभार भी नहीं हो पाता था। गजेटियर में वर्णित तथ्यों से यह पता नहीं चलता कि उस समय की जनता क्या सोचती थी? मानो जनता किसी मशीनी इन्तजाम की तरह स्थिर पूरी तौर पर प्रतिक्रियाहीन थी। राजपूतों की शासन प्रणालियों का मुगलों की सत्ता-संस्कृतियों के अर्न्तविरोध कहीं भी स्पष्ट रूप से नहीं दिखते। फलस्वरूप यह निष्कर्ष निकालना कत्तई अप्रासंगिक होगा कि जनता दोनों सत्ता-सस्कृतियों से परेशान प्रताड़ित थी ऐसी सूरत में इतिहास की स्वाभाविक प्रतिक्रियात्मक या प्रतिरोधात्मक गतिविधियों कहीं नहीं दीखतीं।

व्यक्ति एवं समष्टि, प्रकृति पुरुष के द्वन्दों का आकलन करने पर पर हमें हर काल में मूलरूप से ज्ञात होता है कि भिन्न-भिन्न सत्ता संस्कृतियों ने अपने सत्तात्मक प्रबंधन के निमित्त विशेषाधिकार सम्पन्न वर्गो का निर्माण किया है। कालान्तर में इसी विशेषाधिकार सम्पन्न वर्ग को नौकरशाह, जागीरदार, जमीनदार जैसे नामों से सम्बोधित किया जाने लगा। आदिकाल से लेकर मध्यकाल तक तकनीकी वैज्ञानिक शाहों की कोई जमात थी, ये दोनों सत्ता-प्रजातियॉं आधुनिक काल के द्वारा उत्पादित एवं नियंत्रित हैं। पाषाण-कालीन संस्कृति के दौर में विशेषाधिकार सम्पन्न वर्गो का उत्पादन सत्तासमूहों द्वारा आरंभ हो चुका था तथा दास बनाए जाने की प्रक्रिया भी आरंभ हो चुकी थी। जाहिर है पाषाणकाल के पाए जाने वाले छोटे-छोटे औजार जिन्हेंपिग्मीश्रेणी में रखा जा सकता है, ये स्पष्ट रूप से प्रमाण देते हैं कि इन औजारों के निर्माणकर्ता पुरामानव रहे होंगे जो बतौर  दास पाषाण-कालीन सत्ता-समूहों के यहॉ काम करते रहे होंगे। इतिहासकार मजुमदार एवं पुसांबेकर ने इसे स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है। इस प्रकार हम पाते हैं कि समाजगत ढांचे के अन्तर्गत निवास करने वाला मानव सत्ता-संस्कृति के दबावों आकर्षणों से प्रभावित होकर सत्ता का समर्थक या सत्ता संचालक समूहों में बदल कर एक अलग किस्म की प्रजाति का निर्माण प्रारंभ कर देता है।

विशेषाधिकार संपन्न वर्ग का निर्माण सत्ता-गत आवश्यकताओं के लिए अनिवार्य

रूप से षडयंत्रा था, उस वर्ग से समाज का कुछ लेना देना किसी भी काल में नहीं था। वह वर्ग सत्ता-समूहों के लिए जरूरी था क्यांेकि सत्ता-व्यवस्था में व्यवस्थापक व्यवस्थापित के रिश्ते मानवीय आचारों के हिसाब से परस्पर विरोधी थे। दोनों के हित एक दूसरे से टकराते थे, हितों की यही टकराहट सामाजिक संरचना में दरार पैदा कर शोषित एवं शोषकों की प्रजातियों निर्मित करती थीं। हितांे की टकराहटें युद्धों को आयोजित करतीं थी, समाज में अस्थिरता पैदा करती थीं तथा जीत-हार की बदजात संस्कृति का निर्माण कर एक ऐसे कुजात सोच को जन्माती थीं जिसके आधार पर जीत को महिमामण्डित करते हुए विजेता का दैवी-करण किया जाता था। हितों की टकराहटों की गर्जनाएं हमें हर काल में सुनाई पड़ती हैं।

                   अतीत देखिए पर अपनी आँख से

अपनी ऑख से ही अतीत को देखने उसका विश्लेषण करने का तौर-तरीका इतिहास लेखन की कला को प्रदर्शित कर सकता है जाहिर है इस मुद्दे पर मत समानता भी नहीं रही है। अब यह स्पष्ट है कि जिस दृष्टि से हीगेल, टायनवी, मार्क्स आदि इतिहासकारों ने समाज का अध्ययन कर समाज का विश्लेषण प्रस्तुत किया उसमें आंशिक रूप से ही समानताएं हैं। उनके अध्ययन का बहुलांश मत-भिन्नता का ही है। आज की विकसित दुनिया में अतीत को देखने का काम बहुत जटिल है। खास तौर से इसलिए कि आज के समय में अतीत की तमाम राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक जटिलताएं क्रूरताएं नहीं हैं। अतीत में तो मानव एक ऐसी इकाई की तरह बना दिया गया था जिसकी निजता कुछ थी ही नहीं उसका जो व्यक्तिगत था पूरी तरह शासित शोषित था फलस्वरूप वह मनुष्य के रूप में किसी जड़ उत्पाद की तरह था।

उस अतीत का विश्लेषण करते हुए हीगेल आत्मा के विकास-वाद पर जोर देता है तो मार्क्स पदार्थ की भौतिकता पर। आत्म-विकास बाद एवं भौतिक विकासवाद के अर्न्तद्वन्दों को बीसवीं शताब्दी की दुनिया ने भली-भांति देखा है तथा खुद को मौन स्वीकृति के पक्ष में खड़ा कर लिया है कि दोनों का विकास आवश्यक है। यह सोच-विचार की तीसरी धारा थी जो आत्म के विकासवादियों एवं भौतिकवाद के पक्षधरों दोनों के लिए आलोचनात्मक थी। आत्म-शक्ति इच्छा-शक्ति के बिना केवल भौतिक सत्यों का स्वीकार या भौतिक सत्यों, द्वन्दों के बिना केवल इच्छा-शक्ति का विस्तार, दोनांे  मनुष्य को अकेले-अकेले कुछ भी हासिल करा सकेंगे। मानव की जैविकता के साथ उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विकास को भौतिक सत्यों या द्वन्दों के साथ जोड़ कर देखने से ही मनुष्य सभ्यता के विकास की सीढ़ियों चढ़ सकेगा।

मार्क्स हीगेल के अलावा टायनवी एक ऐसा इतिहास चिन्तक हुआ जो इतिहास में निरन्तर रूप से घटित होते रहने वाले आन्तरिक एवं वाह्य संघर्षों की बात करता

है, इस प्रकार वह इतिहास पर विचार करने के लिए तीसरी पद्धति को विकसित करता है। टायनवी के अनुसार इन्हीं वाह्य एवं आन्तरिक संघर्षों के परिणाम स्वरूप कोई भी सभ्यता या तो व्यवस्थित होकर ऊॅचाई पर पहुॅचती है या तो अव्यवस्थित होकर भहरा जाती है, कभी-कभार यथा स्थितिबादी भी हो जाती है। संघर्ष की निरन्तरता को टायनवी इस सीमा तक स्वीकारता है कि संघर्ष के माध्यम से ही सभ्यताएं यथा-स्थितिवाद का उन्मूलन करती हैं तथा विकसित होने के क्रम को संवारती हैं। टायनवी स्पष्ट रूप से वर्ग-संघर्ष के बारे में कहता है कि सभ्यताओं के आन्तरिक संघर्षों के ही वर्ग-संघर्ष परिणाम होते हैं। टायनवी के अनुसार समाज की सभ्यता का वाह्य संघर्ष उसकी जातीय (छंजपवदंसपजलद्ध संस्कृति तथा सभ्यता में प्रगट होता है। सभ्यताओं के उत्थान-पतन का क्रम समाज के बाह्य संघर्षों से संचालित हेाता है। टायनवी ने इतिहास के अध्ययन-क्रम में यह भी जोरदार ढंग से स्थापित किया है कि इतिहास सिर्फ राजाओं केजय-पराजयका कोई दस्तावेज नहीं है। गौरवशाली पराजय भी किसी जीत से अच्छी हो सकती है तथा घृणित तरीके से  धोखा-पूर्ण जीत भी पराजय की तुलना में निन्दनीय हो सकती है। हर समाज अपनी पतनशीलता की मुक्ति के लिए हर काल में संघर्षशील रहा करता है यह अलग बात है कि उस संघर्षशील इतिहास को साजिशी तौर पर नष्ट कर दिया जाय। हमारे सामने सोनभद्र के अतीत को देखने की कई इतिहास पद्धतियॉ हैं। आत्मा के विकास-बाद के सहारे या तो टायनवी के उत्थान-पत्थान जैसी परिस्थितियों के सहारे से यहॉ के अतीत को देखा जा सकता है। मैं समझता हूॅ, सोनभद्र के बारे में या भारतीय इतिहास लेखन में उत्थान-पतन की कहानियां प्रमुख भूमिका में रही हैं। कम से कम अंग्रेजांे ने तो इसी का सहारा लिया तथा यह बताने समझाने की पूरी कोशिश की कि किस तरह भारतीय समाज कभी भी सांस्कृतिक धार्मिक रूप से एक नहीं था।

पुरामानव काल से लेकर आजादी प्राप्त करने के बीच के काल को अंग्रेजों ने संघर्षों के काल के रूप में चित्रित व्याख्यायित किया है तथा यह स्थापित करने का प्रबल प्रयास किया है कि भारत वर्ष की हर सभ्यता आन्तरिक संघर्षों की शिकार थी। यूरोप की तरह यहॉ भी नस्ली-भेदभाव रहा है, तद्नुसार यहॉ के अतीत की व्याख्या करता है। अंग्रेज इतिहास-कारों के साथ-साथ दूसरे सन्तुलवादी इतिहासकारों ने भी अतीत को स्वमेव घटित होने वाला घटनाक्रमों का पुंज ही माना है जैसे अतीत में ऐसा कुछ भी नहीं था जो मनुष्यता को आक्रान्त कर रहा था, वैयक्तिक एवं सामाजिक विकास के रास्तों पर अवरोध खड़ा कर रहा था। व्यक्ति एवं समष्टि में या प्रकृति पुरुष में किसी प्रकार की सार्थक द्वन्दात्मकता थी ही नहीं। अतीत पूरी तरह जड़ एवं संघर्ष की क्षमताओं से शून्य था। अतीत की खामोशी भविष्य के रास्ते को वर्तमान की घटनाओं के लिए छुट्टा सांड़ों के लिए खुला छोड़ देती है, वैदिक काल से लेकर आधुनिक काल तक समय के साथ जनता के जनप्रतिरोध का पक्ष खामोश रहा है। इतिहास सिर्फ राजाओं कीहमला-बाजकहानियों का विवरण देकर खुद को खतरनाक चुप्पी के हवाले कर देता है। इतिहास लेखन के इस विपरीत-गामी खेल से बचते हुए ही अतीत को जाना-बूझा समझा जा सकता है। आइए एक प्रयास करते हैं सोनभद्र के अतीत व्यतीत को जानने के लिए, राजा-रजवाड़ों की रियासती कथा से अलग जनता की गाथा की तरह।

दरअसल मानव सभ्यता में यह बहुत बड़ी विडंबना है कि हम राजनीतिक विमर्श को समाज के आखिरी पायदान से गुंथित करके नहीं देखते और ही कोई प्रयास करते हैं इस बाबत। हमारा मन और चित्त दोनों सत्ता के सिंहासन से चिपका रहता है और एक सवाल कि हमारा राजा कौन? यह हमें बार बार परेशान करता रहता है। हमारी यही भेंड़ संस्कृति हमें कभी गुलामी की ओर ले जाती है तो कभी कहीं और। पर अब तो लोकतंत्रा है, हमें बहुत ही सावधानी और सतर्कता से अपने सत्ताधारियों का चयन करना होगा और साबित करना होगा कि सरकारें वही मजबूत तथा लोकप्रिय हुआ करती हैं जो जनता के प्रति ईमानदारी से जबाबदेह हुआ करती हैं। सोनभद्र के अतीत को जानने, बूझने का प्रयास चिंतन के इसी प्रस्थान बिन्दु से  किया गया है तथा समझने की कोशिश की गई है कि अतीत में सोनभद्र की राजसत्तात्मक स्थिति क्या थी? यहां की आम जनता किस हाल में थी? प्रति व्यक्ति आय तथा कमाई के साधनों की क्या स्थित थी। किसी भी सरकार का मुख्य कार्य होता है कानून व्यवस्था का जनहितकारी प्रबंधन, वह सरकार चाहे जिस काल की हो, काल का कोई फर्क नहीं पड़ता। कानून व्यवस्था के प्रबंधन के आधार पर ही सत्ता-विमर्श को मूल्यांकित करने का प्रयास किया जाना चाहिए, ऐसा ही प्रयास करने की कोशिश यहां की गई है, देखना यह है कि यह प्रयास आपको कितना प्रभावित करता है? आइए देखते हैं कि प्रयास सफल है या असफ

अतीत-कालीन सत्ता विमर्श...

इतिहास का प्रारंभ

अपने पुरखों की सभ्यता, संस्कृति, रहवास, बुद्धिमत्ता, शक्ति सम्पन्नता आदि समकालीन गुणों एवं अवगुणों के बारे में जानकारी प्रस्तुत करना ही इतिहास की प्रमुख भूमिका है। इस संदर्भ में यह विवादास्पद नहीं है कि सोनभद्र की सभ्यता संस्कृति भारत के अन्य क्षेत्रों से कत्तई अलग नहीं है। 4 मार्च 1989 तक सोनभद्र, मीरजापुर जनपद का ही हिस्सा रहा है। मीरजापुर जनपद भी अंग्रेजी राज-व्यवस्था का एक जनपदीय विभाजन था जिसका आशय मात्रा हुकूमत का प्रबन्धन था। आज सोनभद्र, मीरजापुर से अलग जनपद का रूप पा चुका है पर सोनभद्र का जितना रिश्ता कैमूर की पहाड़ियों से है उससे कम विन्ध्याचल की पहाड़ियों से नहीं है जो मीरजापुर में स्थित है। कन्तित विजयपुर, शक्तेषगढ़ की रियासतों का प्रभुत्व किसी किसी तरह यहां के विजयगढ़ अगोरी राज -यवस्था पर भी रहा है। इसलिए सोनभद्र का अतीत, मीरजापुर से उभयनिष्ठ है। सोनभद्र को समझने के लिए यहॉ की पुरातात्विक सामग्रियों एवं गुफा चित्रों का अध्ययन हमें किसी ऐतिहासिक परिणाम तक पहुॅचा सकते हैं।

                         पुरातात्विक सोनभद्र

मीरजापुर का अंग्रेजी गजेटियर देशी गजेटियर गुफाओं के बारे में बताता है कि इन से किसी सार्थक ऐतिहासिक प्रमाणों के बारे में नहीं जाना जा सकता। गजेटियरोंy का मानना है कि इन गुफाओं से सिर्फ इतना ही प्रमाणित होता है कि सोनभद्र में आदिमानव या पुरामानव रहवास किया करते थे। जाहिर है अपनी सुरक्षा का वे एकमात्रा साधन इन गुफाओं में खोजते थे, हिंसक पशुओं से बचाव का सवाल उनके समक्ष था। यह सर्वज्ञात है कि हमारे पुरखों को रहवास के लिए घर बनाने की कला का ज्ञान तब नहीं था। उन गुफाओं में कई तरह के जो चित्रा पाए गए हैं उनसे भी यह प्रमाणित होता है कि हमारे पुरखों का रहवास इन गुफाओं में था। सबसे महत्वपूर्ण यह तथ्य भी स्पष्ट रूप से उभरता है कि रहवास के उनके सारे केन्द्र नादियों के आस पास ही पाए गए हैं। खासतौर से सोन नदी के दोनों छोरों की पहाड़ियों पर। पुरखों के निवासों का प्रमाण नदियों के पास पाया जाना प्रमाणित करता है कि उस दौर मेंपानीदेख कर या तलाश कर ही रहने, निवसने के बारे में सोचा जाता था,

हमारे अधिकांश पुराने शहर भी तो नदियों के किनारे ही स्थित हैं।

सोन की समीपस्थ पहाड़ियों के इतर, बेलन, घाघर, रेण, विजुल या कि कर्मनाशा

जैसी नदियों के अगल-बगल किसी भी गुफा का पाया जाना प्रमाणित नहीं होता। कर्मनाशा नदी से बहुत दूर सोनभद्र बिहार की कैमूर पहाड़ियों में स्थित गुप्तनाथ एक ऐसी गुफा है जो कम से कम दो तीन सौ मीटर तक पहाड़ के अन्दर है, इस गुफा के बाद थोड़ी सी खुली जगह है जिस पर बगल की पहाड़ी छत की तरह अपने गुरूत्व-बल पर टिकी हुई है। यहॉ पर शिव के गुप्तनाथ उपनाम की पूजा स्थली को विकसित कर दिया गया है। गुप्तनाथ का स्थान गुफा के रूप में एक ऐसा ऐतिहासिक साक्ष्य है जो इतिहास को (410-3920पूर्व) तक की यात्रा कराता है। जिसकी राजधानी कभी पाटलिपुत्रा में हुआ करती थी। सोनभद्र की दूसरी गुफाएं इस तरह का कोई संकेत नहीं छोड़तीं। वे हैं भी तो बहुत ही छोटी छोटी मुश्किल से एक दो आदमी के बैठने सोने की जगह वाली। वैसे उन गुफाओं की दिवारों पर पाये जाने वाले आखेट का भाव व्यक्त करने वाले रेखा-चित्रा हमें अतीत की तरफ ले जाते हैं, कि उस दौर के हमारे पुरखे कलम या कूची से रेखांकन किया करते थे।

शिवद्वार, सिल्थम, पटना, आदि में पाए जाने वाले शिवलिंग संभवतः दूसरी शताब्दी के आस पास के हों जबनव सात बाहनोंकी एक शाखा की अधीनता में कन्तित चला जाता है। कन्तित पर भारशिवों की यह पहली विजय थी लगभग सात-आठ सौ साल ईसा बाद। इस प्रकार हम पाते हैं कि सोनभद्र का अतीत एक तरह से बौद्ध धर्म के प्रवर्धन का भी अतीत रहा है। शिश्शुनाग के वंश का समापन लगभग तीसरी सदी में होता है फिर नया राजवंश नन्दवंश स्थापित हो जाता है जो अशोक तक 272-232 0पूर्व तक निर्वाध रूप से चलता है परन्तु बीच में चन्द्रगुप्त द्वारा 0पूर्व 323 में नन्दवंश का सफाया कर दिया जाता है यहॉ से इतिहास का एक नया अध्याय प्रारंभ होता है जिससे बौद्ध-धर्म के प्रचार-प्रसार वैदिक साहित्य संस्कृति कला के विलोपन का सिलसिला प्रारंभ हो जाता है। इस काल में वैदिक काल की परम्पराएं उपनिषदों की रचनाओं की व्याख्या के प्रति भी जिम्मेवार होती हैं पूरा उपनिषद काल वैदिक काल की परंपराओं के विमर्श का काल रहा है। बौद्ध धर्म काप्रतीत्य समुत्यपादयानि कि प्रत्येक वस्तु अपनी उत्पत्ति के लिए किसी दूसरे वस्तु पर निर्भर है जिससे कार्य-कारण के कारणता संबंधी सोच का वैज्ञानिक सूत्रा निकलता है।अनित्यवादजैसा दूसरा सूत्रा भी इसी काल में प्रसार पाता है कि वेदों की यह स्थापना कि वस्तु नष्ट नहीं होती, अनित्यवाद के अनुसार हर वस्तु नाशवान है तथा नष्ट होना उसकी प्रकृति है। बौद्ध धर्म का तीसरा सूत्राअनात्मकवादभी वैदिक अवधारणाओं पर कड़ा प्रहार करता है कि स्थाई आत्मा जैसी कोई चीज नहीं हुआ करती। छठी शताब्दी ईसा पूर्व का काल एक प्रकार से शास्त्रों के विमर्श का महत्वपूर्ण काल था। इस काल को उस काल से भी जोड़कर देखना चाहिए जब उपनिषदों के रचना विधानों द्वारा वैदिक मान्यताओं को अस्वीकार करने का वैचारिक प्रयास किया जा रहा था।

पुरा वैदिक काल तथा उत्तर वैदिक काल शास्त्रों के विमर्श का काल भी था। इन्हीं

कालों में उपनिषदों की रचनाएं सृजित होती हैं जिसका मूल सत्य था किआत्माब्रह्मदोनों अलग सत्ताएं नहीं हैं वरन् दोनों एक ही हैं प्रकारान्तर से यह दर्शन वैदिक सत्यब्रह्मकी अवधारणा पर प्रहार करता है। अम्बेडकर लोहिया जैसे राजनीति कर्मी समाज वैज्ञानिक इस तथ्य को भी स्वीकारते हैं कि उस युग में ब्राह्मण तथा क्षत्रिय दोनों अभिजात समूहों के विशेष महत्वपूर्ण ध्रुव थे इसलिए इन दोनों में संघर्ष भी चला करता था। डा0 अम्बेडकर ने तो ब्राह्मण तथा क्षत्रिय युद्धों को वर्ग-युद्ध की संज्ञा दिया है। इन युद्धों का विवरण देते हुए डा0 अम्बेडकर ब्राह्मण राजा वेणु के युद्ध को पहला युद्ध मानते हैं। दूसरा युद्ध, राजा पुरूरवा से, तीसरा युद्ध, राजा निमि से चौथा युद्ध, वशिष्ठ और विश्वमित्रा के बीच हुआ था। इस प्रकार हम पाते हैं कि ब्राह्मण तथा क्षत्रिय दोनों वैदिक काल उत्तर वैदिक काल में अपने-अपने राजसत्तात्मक हितों के लिए संघर्ष-रत थे।

बाद के समय में ब्राह्मणों ने क्षत्रियों के विशेष क्षेत्र शस्त्रों के परिचालन की दक्षता हासिल करना आरम्भ कर दिया। वशिष्श्ठ तथा विश्वमित्रा के युद्ध में शस्त्रों की उपयोगिता की ही जीत होती है तथा यह भी प्रमाणित होता है कि क्षत्रियों ने अपने पारंपरिक शस्त्रा ज्ञान के साथ-साथ शास्त्रों के ज्ञान की तरफ खुद को उन्मुख कर लिया था। इस प्रकार शस्त्रा तथा शास्त्रा दोनों प्रभुत्वशाली वर्ग ब्राह्मण तथा क्षत्रिय दोनों के लिए अध्ययन सीख के प्रमुख विषय बन गए। सोनभद्र को समझने के लिए आवश्यक होगा कि बुद्ध, महावीर जैसों के ऐतिहासिक हस्तक्षेप को भी ध्यान में रखा जाये। बौद्ध मठ अहरौरा की सूचना सोनभद्र को भी प्रभावित करती है हालांकि सोनभद्र में किसी भी बौद्ध-बिहार का प्रमाण नहीं मिला है।

सोनभद्र की प्राचीनता तो विजयगढ़ परगना केनल राजास्थान पर 1995-96 में पुरातत्व विभाग द्वारा हुई खुदाई से भी प्रमाणित है। पुरातत्व विभाग का मानना है किनल राजाकेे स्थान पर हुई खुदाई से चार सांस्कृतिक काल-क्रमों का पता चलता है। यहॉ से काले लाल पात्रा के साथ-साथ काले लाल लेपित पात्रा, पत्थर के मनके, पक्की मिट्टी के मनके, अस्थि-वाणाग्र, पत्थर के उपकरण, लोहे के उपकरण भी प्राप्त हुए हैं। यहॉ के उत्खनन से चूल्हों तथा वृत्ताकार झोपिड़यों का भी पता चलता है। अंग्रेजों की खोज से यह तात्कालिक खोज सर्वथा अलग है क्योंकि गुफाओं की आवासीय व्यवस्था के अलवा अंग्रेजों को पहले यहॉ कुछ भी प्राप्त हुआ था। आवासीय व्यवस्था की झोपडियां तथा चूल्हा ये दोनों प्रमाणित करते हैं कि तत्कालीन हमारे पुरखे, केवल आवास वरन् आग की भी खोज कर चुके थे। पत्थरों के उपकरण तथा अस्थियों के बाण आदि पाषाणकाल के इतिहास गति की सूचना देते ही हैं।

अंग्रेज खोजी लोगों ने सोनभद्र मीरजापुर में प्रमुखता से पत्थरों के उपकरण पाए हैं। इनमें कुछ टुकड़े फासिल्स के भी पाए गए हैं। पत्थरों के उपकरणों में पूर्ण रूप से पत्थर के चाकुओं की पहचान की गई है। अंग्रेजों का मानना है कि सारे प्राप्त उपकरण घरेलू उपयोग के किस्मों के हैं। अधिकांश उपकरणों का निर्माण सुलेमानी पत्थरों से किया जान पड़ा। जो कड़े पत्थर थे उनके धार काफी चिकने थे। कुछ का अनुमान है कि ये उपकरण चेटर््ज (ब्ीमतजे) पत्थर के भी बने हो सकते हैं। इन हथियारों तथा औजारों के बारे में सूचना मिलती है कि उनका उपयोग आरी, रेती तथा कुदाल के तौर पर किया जाता रहा होगा। आश्चर्यजनक एक औजार भी पाया गया जो सुई की तरह पतला तथा दस इंच लम्बा था इसकी नोक भी सुई की तरह थी। कुल्हाड़ी जैसा औजार पूरे सोनभद्र तथा मीरजापुर में कहीं भी नहीं पाया गया। इतिहासकारों का मानना है कि कृषि के विकास-क्रम में कुल्हाड़ी तथा फावड़े की प्रमुख भूमिका होती है। कुल्हाड़ी से झाड़-झंखज्ञड़ काटा जाता हैऔर फावड़े से खेती करने लायक खेत समतल बनाया जाता हैै तो क्या इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पाषाण-कालीन सभ्यता जो कृषि के विकास क्रम का प्रांरभिक काल है वह सोनभद्र में नहीं थी? लेकिन ऐसा निष्कर्ष निकालना पूरी तरह से गलत होगा।

सोनभद्र मीरजापुर में पाए गए पत्थरों के उपकरण औजार छोटे-छोटे ;च्पहउल चसपदजेद्ध थे। इन हथियारों औजारों तथा उपकरणों से यह स्पष्ट है कि ये सारे के सारे पाषाण-कालीन थे। पाषाणकालीन ;छमवसपजीपबद्ध मानव पत्थरों को तराशने तथा हथियार औजारों बनाने की कलाएं सीख रहा था। इससे यह भी ज्ञात होता है कि पाषाण-कालीन अभिजात्य समूहों द्वारा आदिमानवों (।इवतपहपदंस) को दास बना लिया गया होगा तथा उनसे पत्थरों के उपकरण औजाkर बनवाने का कार्य कराया जाता रहा होगा। 

अंग्रेज रिवेट कार्नाक ;त्मअमजज ब्वउंबद्ध तथा काकबर्न ;ब्वबा ठनतदद्ध ने एक ऐसी गुफा का भी पता लगाया है जो छह फीट गहरी थी तथा इसका रूख उत्तर-दक्षिण की दिशा में था। इस गुफा के ऊपर एक लम्बा पत्थर पड़ा हुआ था पत्थर की लम्बाई 12 फीट थी। गुफा में एक अस्थि पंजर था तथा उसके पास एक चमकीला पत्थर भी पड़ा हुआ था जो प्रथम द्रष्टया किसी फूलदान की तरह दीखता था। पास में दूसरी गुफा भी थी जिसका द्वार खुला हुआ था उसके भीतर पत्थरों के उपकरणों औजार पड़े हुए थे। इस गुफा के आधार पर मृतकों के शव-विसर्जन की प्रथा पर प्रकाश पड़ता है। पुरा मानव मृतक के शव को दफनाते थे, फेंकते थे या जलाते थे यह इतिहास के लिए विचारणीय रहा है। इतिहासकारों का मानना है कि मृतक के शवों को दूर जंगल में कहीं विसर्जित कर दिया जाता था। शवों को जलाने या दफनाने की प्रथायें इतिहास की गतिशीलता में प्रकाश में आई जिसका सीधा संबंध कर्म-काण्ड जैसी व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। वैदिक-काल के निषेधों समर्थनों पर आधारित जिन कर्म-विधानों का सृजन किया गया उनमें जन्म, विवाह के साथ-साथ मृतक के शवों के बारे में भी विधान किया गया।

पत्थरों की कलात्मकता आज भी सोनभद्र में यत्र-तत्र देखी जा सकती है। पूरा सोनभद्र जनपद मूर्तियों एवं भित्ति-चित्रों के जाल से पटा हुआ है। शिवद्वार की शिव प्रतिमा के अलावा गोठानी के छोटे-छोटे मन्दिरों के नमूने इस बात को प्रमाणित करते हैं कि चुनार की तरह यहां भी पाषाण-शिल्प की कार्यशालाएं चला करती थीं। शिल्प कलाओं के बारे में सबसे पहला अनुमानकाकबर्नने किया था। उसने यह भी स्थापित किया कि यहां पाए जाने वाले पत्थर जो औजार या उपकरण की तरह प्रतीत होते हैं वे कलाकारिता के नमूनों की तरह थे। काकबर्न ने ही इन पाषाण उपकरणों पर लाल रंग का पता लगाया जो संभवतःआयरन आक्साइडका होगा। गुफाओं में पाए जाने वाले उपकरणों पर जो चित्राकारी थी, उनके रंग लाल तथा पीले थे। वैसे भी आयरन आक्साइड का रंग पक्का होता है, जिस पर हवा तथा पानी का विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता। इन पत्थरों के टुकड़ों पर की गई चित्राकारिता से उस काल के लोगों के बारे में उनकी कला अभिरूचियों का ज्ञान प्राप्त होता है। सामान्य रूप से ये पत्थर ग्रेनाइड तथा कठोर पत्थर से बने थे। इनमें चमक थी तथा ये बारीकी से तराशे हुए थे। इन पर जो चित्राकारियों की गई थी उनमें शिकार का दृश्य प्रमुखता से प्रदर्शित किया गया था। काकबर्न को ये चित्राकारियॉ अवर्णनीय जान पड़ीं थीं।

खोज अभियान के दौर में ही काकबर्न ने एक ऐसी गुफा की भी खोज की जो एक प्रकार से कला-संग्रह की तरह प्रतीत होता था। काकबर्न का अनुमान था कि ये सारी चित्राकारियों अशोक कालीन थीं वैसे वह दुविधा में था कि संभवतः अशोक के पहले की भी हों लेकिन उसकी दुविधा ठीक नहीं थी क्यांेकि अशोक के शिला-लेखों के निर्माण की कार्यशाला उस काल में चुनार मंे थी जो प्रमाणित है। इस सन्दर्भ में सिर्फ इतना कहा जा सकता है कि सोनभद्र के चित्राकारी युक्त पाषाण औजार भले अशोक के काल के हों पर अशोक काल के आस-पास के तो होंगे ही, हो सकता है वह काल अशोक वंश के आखिरी अधिपतिबृहद्रथके पूर्व का हो, क्योंकि अशोक के मगध का साम्राज्य अशोक के पोतों दशरथ सम्प्रति ने बांट लिया था। ईसा पूर्व 210 के आस-पासशुंग साम्राज्यस्थापित हो चुका था।

इस आश्चर्यजनक गुफा में काकबर्न को एक ऐसा चित्रा भी प्राप्त हुआ था जिस पर नौ ग्रह प्रदर्शित थे। हिन्दू बेदावलम्बियों के लिए नौ ग्रहों की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका हैै। नौ ग्रहों की इस चित्राकारिता से सहज ढंग से काकबर्न इस निष्कर्ष पर पहुंच सकता था कि इनके चित्राकार काफी सभ्य जागरूक रहे होंगे।

कहीं-कहीं लोहे के तीर वगैरह भी सोनभद्र में पाए गए हैं जिसे काकबर्न ने आधुनिक माना है। इन गुफाओं से अलग एक ऐसी गुफा की खोज भी काकबर्न ने की जिस पर एक शहर का नक्शा चित्रित था। नक्शे में नगरवासियों का जीवन उकेरित था। कपड़े आदि से सज्जित मानव का चित्रा उत्तर का जान पड़ता था जो इस तथ्य की पुष्टि करता था कि पुराकाल में मानव की सभ्यताएं उत्तर से दक्षिण की तरफ गई हांेगी। कुछ चित्रा जो शिकार के थे उनमें बाघ चित्रित था तथा मानव आकृति उसका पीछा करती हुई थी। कुछ चित्रों में रथ भी चित्रित किए गए थे। रथ का सीधा संबंध युद्ध कालीन विकसित भारत से है। एक तरह से महाभारतीय युद्ध परिवेश। चित्राकारियों में चित्रित मानव के बाल कन्धे तक लटके हुए थे। वे घाघरा या उसी तरह के वस्त्रा धारण किए हुए थे। किसी चित्रा में स्तूप भी चित्रित किया गया था। काकबर्न का मानना है कि इस तरह के शिकार के चित्रा या मानव के चित्रा जर्मनी तथा स्विटजर लैण्ड में तलाशे गए हैं।

इन विविध चित्राकारियों के अलावा कुछ ऐसे चित्रा भी पाए गए जिससे मालूम होता था कि मानव विद्रोह की अभिव्यक्ति कर रहा हो। वे चित्रा युद्धों के विवरणों से परिपूर्ण थे। रथ तथा रथ के पहिए घोड़े तथा खच्चर भी प्रदर्शित थे। काकबर्न ने पशुओं की पूछों की लम्बाई से निष्कर्ष निकाला कि वे घोड़ांे के ही चित्रा रहे होंगे। दूसरे प्रकार के चित्रों में गैंडा, हिरन तथा भालू भी चित्रित थे। एक चित्रा तो गैंडो के शिकार का भी था जिसके पीछे एक आदमी भाला लिए हुए पीछा करता हुआ दिखाया गया था।

कृषि के विकास काल में पशु-पालन खेती (कृषि-कार्य) तथा शिकार करना तत्कालीन समाज के लिए अनिवार्य कर्म था इसलिए ऐसा आभास मिलता है कि सोनभद्र की कृषि-संस्कृति उस जमाने में विकसित थी। जहां तक गुफाओं का     सबंध है उससे उस काल का पता मिलता है जब मानव घुमक्कडी वृत्ति का था, कहीं से आया तथा कहीं चला गया। ऐतिहासिक साक्ष्य इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं कि विन्ध्याचल पहाड़ी सिद्धों सन्तों की शरण स्थली रही है। गुफा चित्रों से भ्रम नहीं रह जाता कि सोनभद्र के हमारे पुरखों ने ही इनकी रचना की होगी। सभ्यता के विकास-क्रम में आर्यों तथा द्रविणों के संघर्ष की एक निर्णायक भूमिका रही है। प्रारंभ में ही जो लोग उत्तर से होकर दक्षिण की तरफ गए लगता है वे यहीं के होकर रह गए फिर इनकी वापसी दक्षिण से उत्तर की तरफ नहीं हुई।

उन वर्णित चित्रों का चित्रांकन लाल, पीले रंगों से या सफेद चूने के यौगिकों से किया गया है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय द्वारा कोयल नदी के 22 किमी0 दूर पथराहो नदी में मिट्टी के कुछ ढूहों का पता लगाया गया जिसमें काले लाल रंग के कीमती पत्थर के टुकड़े पाए गए जबकि इन ढूहों में कहीं भी काली धातु नहीं पाई गई। बनारस के काकोरिया में पाए गए सामानों से इनकी समानता प्रमाणित होती है कि गंगा की काली मिट्टी की सभ्यता यहां भी थी। यह अस्पष्ट नहीं रह जाता है कि सोनभद्र की सभ्यता प्राचीन है तथा बनारस से मिलती जुलती है। काली मिट्टी की  संस्कृति कृषि-समाज की उपलब्धियों में से है जो सहभागिता तथा सहकार को बढ़ावा देती है दूसरी जो व्यापारिक संस्कृतियॉ हैं वे तो केवल पक्षपातपूर्ण प्रतिस्पर्धा ही सृजित करती हैं जिससे सामाजिक समरस्ता का क्षरण होता है। मानव-सभ्यता का कृषिक सभ्यता से बाहर निकल जाना यह सर्वथा दुखद रहा है पर अब तो युग बदल चुका है हम व्यापारिक युग में प्रवेश कर चुके हैं और हमारा पुरा-काल अब केवल अध्ययन शोध का विषय बन कर रह गया है।

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