यानिआजादी की ओर बढ़ते कदम
सोनभद्र का इतिहास पांचवां भाग
1857 के प्रथम स्वतंत्राता संघर्ष का दौर मीरजापुर व सोनभद्र के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण रहा है। संयुक्त मीरजापुर में क्रान्तिकारियों के जत्थे बिना किसी भय के अंग्रेजी सरकार के खिलाफ उठ खड़े हुए थे। 1857 के समय मीरजापुर के प्रशासन के लिए जिले में शान्ति-व्यवस्था बनाए रखना अत्यन्त कठिन कार्य था। मीरजापुर व राबर्ट्सगंज के व्यापारी समुदाय के लोग भी स्वतंत्राता सेनानियों के साथ एक-जुट हो गए थे। 1857 के समय मीरजापुर के जिला-मजिस्ट्ेट जार्ज टक्कर थे। उस समय ट्रेजरी में महज दो लाख रूपये थे जिसकी सुरक्षा के लिए फिरोजपुर रेजिमेन्ट के सिखों को नियुक्त किया गया था।
जिले में मेरठ व दिल्ली के विद्रोहों की सूचना 19 मई को आग की तरह फैल गई। प्रशासन की तरफ से पूरे जिले मे सख्त पहरे लगा दिए गए तथा आवश्यक जगहों पर प्रशासननिक अवरोध खड़े कर दिये गए जिससे बाहरी स्वतंत्राता संग्राम सेनानियों का जिले में प्रवेश करना असंभव हो जाये। मेरठ तथा दिल्ली के विद्रोहों की सूचना तो थी ही इसी के साथ बनारस जौनपुर के विद्रोहों की भी सूचना पूरे जिले को उत्तेजित व आवेशित कर गई थी। 6 जून 1857 के समय मीरजापुर में सर्वत्रा स्वतंत्राता सेनानियों की धमक फैल चुकी थी तथा प्रशासन शान्ति-व्यवस्था की स्थापना के लिए हर तरह की आक्रामक व दमनकारी कार्यवाहियों करने पर उतारू हो गया था। प्रशासन की तरफ से सैतालीसवीं बटालियन को भी सुरक्षा में लगाया गया था, उसके साथ ट्रेजरी का साठ हजार रूपये भी हलाहाबाद भेज दिया गया। सुरक्षा गार्डो को हिदायत दी गई कि वे अपने साथ अधिक कारतूस तथा हथियार न ले जायें क्योंकि उसेे छीने जाने की संभावना बढ़ चुकी थी। सावधानी के तौर पर प्रशासन द्वारा सारे हथियार व कारतूस अंग्रेज कोलोनल पाट के आदेश से नदी में फेंक कर नष्ट कर दिए गए। बाकी खजाने को बनारस स्थान्तरित कर दिया गया। उस समय नदी का रास्ते या रोड के रास्ते कत्तई सुरक्षित नहीं थे। हर तरफ स्वतंत्राता के लड़ाकू दौड़ रहे थे तथा प्रशासन को चोटिल तथा आहत करने के प्रयासों में थे। अकोढ़ी के सशस्त्रा ठाकुरों ने मीरजापुर के सरकारी काम-काज को बाधित करने की कसमें खा रखी थीं। अकोढ़ी की तरह मांडा के ठाकुर भी विद्रोह पर उतारू थे तथा प्रशासन के काम-काज को बाधित कर रहे थे। मीरजापुर के इतिहास में 10 जून 1857 का दिन nबहुत महत्वपूर्ण है। उसी दिन हजारों स्वतंत्राता संग्राम सेनानियों का दिल-दिमाग प्रशासन की दमनकारी नीतियों के कारण इतना आक्रमक हो गया कि पूर्वी रेलवे के सारे सामानों को नष्ट कर दिया गया। उस समय रेलवे का कार्य निर्माणधीन था। स्वतंत्राता संग्राम सेनानियों ने रेलवे के सामानों को दिन के साफ उजाले में नष्ट किया तथा लगातार नारा लगाते रहे कि हम आजाद हैं,‘स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है’। अंग्रेज अधिकारियों ने हजारों लोगों के इस शान्तिपूर्ण प्रदर्शन को स्थागित व दमित करने के लिए प्रदर्शनकारियों के नेतृत्व के 27 लोगों को गिरफ्तार कर लिया फिर तो प्रदर्शनकारियों की भीड़ हिंसक हो गई तथा रेलवे के सारे सामानों को देखते-देखते नष्ट कर दिया। मीरजापुर के लोगों ने स्वतंत्राता के लिए जो प्रयास किया वह इतिहास में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां के लोग सारा कुछ शान्तिपूर्ण ढंग से कर रहे थे तथा स्वतंत्राता प्राप्ति उनका निर्णायक लक्ष्य था। शान्तिप्रिय प्रदर्शनकारियों की जबरिया गिरफ्तारी ने यहां के लोगों की शान्ति-प्रियता को छिन्न-भिन्न कर दिया था।
स्वतंत्राता संग्राम के जंग-जूओं में खतरनाक उत्तेजना फैल गई कि हर हाल में अंग्रेज अधिकारियों को परेशान करना है। स्वतंत्राता संग्राम के सेनानियों को कहीं से सूचना मिली कि अंग्रेजी सेना मीरजापुर में प्रवेश करने वाली है तथा उसे स्वतंत्राता के आकांक्षियों का दमन करने लिए बुलाया गया है फिर तो स्वतंत्राता के रक्षकों ने पूरी तरह क्रान्तिकारी निर्णय ले लिया। पुराने पोस्ट आफिस के बगल में देखते-देखते भयानक खाईं खोद दी गई पर अंग्रेजी सेना मीरजापुर में नहीं आई। बाद में प्रशासन काफी गंभीर हो गया तथा चुन-चुन कर स्वतंत्राता रक्षकों को फौजदारी की घृणित धाराओं मंे गिरफ्तार करने लगा।
गौरा गांव
के ठाकुरों द्वारा नदी व
रोड दोनों तरफ से जिस भांति अंग्रेज अधिकारियों की नाके-बन्दी की गई वह महत्वपूर्ण है। गौरा गॉव के ठाकुरों ने अंग्रेजों को मीरजापुर से इलाहाबाद के लिए निकलना मुश्किल कर दिया। गौरा ही नहीं भरपूरा व पहाड़ा के लोगों ने भी मीरजापुर से बनारस तक के रास्ते को बाधित कर दिया। गौरा के लोगों ने बाकायदा अपना मुख्यालय रामनगर सीकरी में बनाया तथा खुले-आम अंग्रेजों के आवागमन पर पाबन्दी लगा दी। 22 जून को गौरा के स्वतंत्राता रक्षकों ने अंग्रेजों पर हमला किया लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। अंग्रेजों की भारी सैनिक व पुलिसिया शक्ति से हमले को दमित कर दिया गया। इस प्रकार गंगा नदी का दक्षिणी किनारा व इलाहाबाद के रास्ते को अंग्रेजों ने गौरा के स्वतंत्राता रक्षकों से मुक्त करा लिया।
गंगा नदी का बायां किनारा भी उस समय सुरक्षित न था। भदोही के मौनस राजपूतों ने वहां संगठित होकर अंग्रेज अधिकारियों के आवागमन को रोक दिया था। वहां का विद्रोह मौनस राजपूत अदावत सिंह के नेतृत्व में चल रहा था। उनके बारे में पहले से ही ज्ञात था कि अदावत सिंह स्वघोषित राजा हैं तथा किसी की अधीनता
उन्हंे स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने ग्राण्ड ट्रक रोड को बाधित कर दिया था। बनारस के राजा के किसी एजेन्ट ने अंग्रेजों के सहयोग से मौनसों के मुखिया अदावत सिंह तथा उनके दीवान को गिरफ्तार कर लिया। उन्हें तत्काल फांसी पर लटका दिया गया। मुखिया की विधवा ने तत्कालीन मजिस्टेट मूर का सिर मांगा था यह एक अत्यन्त नाटकीय उत्तेजना थी क्योंकि मूर ने ही मौनसों के मुखिया को फांसी पर लटकवाया था। मूर चार जुलाई 1857 को तमाम गिरफ्तार किये गए लोगों के मुकदमों की सुनावाई पाली फैक्टरी में कर रहा था। उसी दिन झूरी सिंह राजा के रिश्तेदार ने हजारों स्वतंत्राता रक्षकों के सहयोग से मूर को घेर लिया तथा मूर के साथ फैक्ट्री के दो अंग्रेज प्रबन्धकों को भी मार गिराया। मूर के सिर को राजा अदावत सिंह की विधवा के सामने रखा गया। लगभग दो साल बाद झूरी सिंह को गिरफ्तार किया गया तथा फांसी पर चढ़ा दिया गया। इस प्रकार क्रान्तिकारी अदावत सिंह व झूरी सिंह की हत्या कर अंग्रेजों ने किसी तरह जिले पर नियंत्राण स्थापित किया।
बिजयगढ़ के राजा लक्ष्मण सिंह और
1857 का मुक्ति संग्राम
अगस्त के महीने में सूचना फैली कि दीनापुर के स्वतंत्राता रक्षक राबर्ट्सगंज, शाहगंज होते हुए मीरजापुर से इलाहाबाद के लिए प्रस्थान करेंगे। प्रश्शासनिक तैयारियां पूर्ण की जानेे लगीं तभी खबर आई कि वे लोग इलाहाबाद के लिए प्रस्थान कर चुके हैं। इसके बाद सूचना मिली कि हजारी बाग के स्वतंत्राता रक्षकांे की एक टोली मीरजापुर में प्रवेश करने वाली है। अंग्रेजों ने उन्हें सोन नदी पर ही रोक दिया तथा वे लोग फिर सिंगरौली होते हुए रींवा की तरफ चले गए।
मीरजापुर तथा सोनभद्र के इतिहास में झूरी सिंह व अदावत सिंह के विद्रोह के बाद शाहाबाद के स्वतंत्राता रक्षक वीर कुअर सिंह का रामगढ में आना सबसे महत्वपूर्ण
घटना है। कॅुअर सिंह के रामगढ़ में आने के बाद मीरजापुर का दक्षिणांचल आज का सोनभद्र स्वतंत्राता प्राप्ति की छट-पटाहट में उछलने लगा। 24 अगस्त 1857 का दिन सोनभद्र के रामगढ़( बिजयगढ़ राज) के लिए तथा पूरे सोनभद्र के लिए स्वतंत्राता प्राप्ति का एक सपना था तथा उस दिन के बाद से पूरा सोनभद्र जो पहले सुप्त पड़ा था, जाग उठा। हर तरफ स्वतंत्राता रक्षक अपने सीमित साधनों के साथ स्वतंत्राता संघर्ष के पक्ष मंे उठ खड़े हुए। सोनभद्र में कुॅअर सिंह लगातार पांच दिन तक प्रवास करते हैं तथा रावटर््सगंज, शाहगंज, घोरावल होते हुए 29 अगस्त को स्पतंत्राता संघर्ष अभियान के लिए इलाहाबाद की ओर प्रस्थान कर जाते हैं। वैसे कॅुअर सिंह को रींवा जाना था पर सुरक्षा कारणों से वे इलाहाबाद के लिए प्रस्थान करते हैं। कॅुअर सिंह के रामगढ़ आगमन से पूरा विजयगढ़, स्वतंत्राता प्राप्ति की शाश्वत उत्तेजना से ओत-प्रोत हो गया। फिर तो विजयगढ़ वासियों के लिए अंग्रेज राक्षस जैसे दिखने लगे। विजयगढ़ जो कभी अहिंसा का पुजारी था आक्रामक हो उठा, हर तरफ मारो-काटो की जिदंे फैल र्गइं। विजयगढ़ के बाबू लक्ष्मण सिंह के नेतृत्व में चन्देल राजपूत तथा अन्य राजपूत स्वतंत्राता रक्षकों की मशाल लेकर संगठित होने लगे तथा सासाराम से आने वाले स्वतंत्राता रक्षकांे की बाट जोहने लगे। कुॅअर सिंह ने स्वतंत्राता प्राप्ति के लिये सेना के गठन की योजना बनाया था तथा रामगढ़ (विजयगढ़) से सैनिकों को वहां जाना था। लक्ष्मण सिंह ने कुॅअर सिंह को सहयोग देने का वादा किया था। विजयगढ़ की पूरी राज-व्यवस्था लक्ष्मण सिंह ने अपने अधीन कर लिया था, अंग्रेजों के विरोध में उठ खड़े हुए थे तथा अंग्रेजों का राजस्व देना बन्द कर दिया था। श्रुति है कि उन्होंने तत्कालीन अंग्रेजी तहसीलदार को छह महीने तक बन्दी बना लिया था और खुद को स्वतंत्रा घोषित कर लिया था।
बाबू लक्ष्मण सिंह का दमन करने के लिए अंग्रेज कलक्टर टक्कर जनवरी 1858 में विजयगढ़ आया। उस समय सारे स्वतंत्राता रक्षक रोहतास के जंगल में अपना कैम्प डाले हुए थे। टक्कर ने 9 जनवरी 1858 को लक्ष्मण सिंह पर पर हमला किया। उस हमले में अनेक स्वतंत्राता रक्षक मारे गए तथा बहुत पकड़े गए जिन्हें बाद में फांसी पर लटका दिया गया। विजयगढ़ के स्वतंत्राता रक्षकों के महत्वपूर्ण नेता रींवा की तरफ भाग निकले। उन लोगों ने रींवा की तरफ से एक बार फिर स्वतंत्राता संघर्ष किया पर वह सफल न हो सका। पूरे जिले में लक्ष्मण सिंह के अंग्रेजी विरोध की घटना महत्वपूर्ण थी और चर्चित भी। क्योंकि मौनस सामन्तों के अलावा दूसरे चन्देल गहरवार या बेन वंशी सामन्त अंग्रेजों के विरोध में उस समय नहीं थे। विजयगढ़ के चन्देल तथा भदोही के मौनसों ने स्वतंत्राता संघर्ष में हिस्सा लेकर सोनभद्र व मीरजापुर के हजार साल के अतीत को नये वैचारिक पृष्ठ-भूमि में समझने का अवसर प्रदान कर दिया था। 1857 के स्वतंत्राता संघर्ष का व्यापक प्रभाव भारत के हर क्षेत्रा पर समान
रूप से पड़ा था। 1857 के एक साल पहले 1856 में अंग्रेजों ने अवध की नवाबी हड़प लिया था। फलस्वरूप पूरा अवध तथा अवध की बेगम हजरत महल ने भी स्वतंत्राता संघर्ष में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था तथा झांसी की रानी, नाना साहब, राजा बेनी माधव सिंह, अजीमुल्ला, बख्त खॉ जैसे लोगों ने भी विद्रोह कर दिया था। इस तरह के विद्रोहों की चर्चा पूरे देश में थी तथा इसका व्यापक प्रभाव बिजयगढ़ पर भी पड़ा था। विजयगढ़ के चन्देल लक्ष्मण सिंह तथा भदोही के मौनस अदावत सिंह व झूरी सिंह क्रांतिकारी रास्ते पर बढ़ निकले थे। यह भी सच है कि अंग्रेजों ने 1857 के विद्रोह को बहुत ही सख्ती व क्रूरता के साथ दमित कर दिया था फलस्वरूप स्वतंत्राता प्राप्ति की चाहना पूरे भारतवासियों के लिए आवश्यक मांग बन गई थी। सोनभद्र के लिए लक्ष्मण सिंह का अंग्रेजों के विरोध में उठ खड़ा होना सर्वथा एक नई बात थी अब तक माना यही जाता था कि राजवंश के लोग अंग्रेजों से या अपने से मजबूतों से विरोध नहीं किया करते थे। राजवंश के लोगों का प्रत्यक्ष विरोध देखकर विजयगढ़ की जनता भी आवेशित हो उठी तथा हजारों लोग लक्ष्मण सिंह के साथ चल निकले। स्थानीय दन्त कथा के अनुसार टक्कर ने लक्ष्मण सिंह को तथा उनके सैकड़ों समर्थकों को गोली से भुनवा डाला था। इस प्रकार विजयगढ़ की जनता को पूरे मीरजापुर में सबसे गंभीर क्षति उठानी पड़ी थी।
सॉसत में अंग्रेज तथा उनका राज-प्रबन्धन
1857 का विद्रोह अंग्रेजों के लिए एक सबक था। अंग्रेजों ने महसूस कर लिया था कि भारत में लम्बे समय तक अंग्रेजी राज चलाना आसान नहीं रह गया है सो अंग्रेजों ने पुराने कड़े कानूनों को शिथिल करने के अलावा सुधार व विकास के कार्यो पर भी ध्यान देना प्रारंभ कर दिया। फिर भी अंग्रेजों की लुटेरी नीति का व्यापक प्रभाव मीरजापुर व सोनभद्र पर पड़ा था। वैसे देश भर में छितराए स्वतंत्राता रक्षकों के लिए 1857 का विद्रोह एक विचारश्शील पाठ बन चुका था कि देश की स्वतंत्राता पाने के लिए किसी मजबूत संगठन की आवश्यकता है जिससे कि स्वतंत्राता प्राप्ति की जनतांत्रिक लड़ाई को मजबूती से लड़ा जा सके। इस सन्दर्भ मंे अच्छी बात मीरजापुर में यह हुई कि 1890 व 1895 के मध्य मीरजापुर में कांग्रेस कमेटी की इकाई का गठन हो गया। इस कमेटी के गठन के बाद मीरजापुर जनपद में स्वतंत्राता प्राप्ति की चेतना व जागरूकता का प्रचार प्रसार होने लगा तथा पूरे जनपद में स्वतंत्राता रक्षकों की इकाइयां बनाई जाने लगीं। 1905 में कांग्रेस का एक अधिवेशन बनारस में हुआ। बनारस का अधिवेशन गोपाल कृष्ण गोखले की अध्यक्षता में आयोजित किया गया था। इस अधिवेशन में बाल गंगाधर तिलक लाला लाजपत राय तथा मदनमोहन मालवीय ने भाग लिया। इस प्रकार बनारस का अधिवेशन पूरे पूर्वाचल के लिए एक आन्दोलन की तरह था जिसका व्यापक प्रभाव मीरजापुर पर भी पड़ा। मीरजापुर की कमेटी के लोगों ने संगठन का प्रचार-प्रसार काफी तेज कर दिया वैसे भी 1905 तक कांग्रेस पार्टी में इस जनपद की छवि बहुत ही अच्छी बन गई थी। उपेन्द्रनाथ बनर्जी तथा बैरिस्टर युसूफ इमाम के कारण जनपद मीरजापुर स्वतंत्राता प्राप्ति के संघर्षों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेने लगा था। स्थानीय कांग्रेस पार्टी की अध्यक्षता उपेन्द्रनाथ बनर्जी जैसे समर्पित नेता को सौपी गई। 1910 तक पूरा जनपद कांग्रेस पार्टी के सहयोग में उठ खड़ा हुआ था।
महात्मा गांधी ने 1921 में असहयोग व
सविनय अवज्ञा आन्दोलन का प्रारम्भ पूरे भारत में कर दिया था। महात्मा गांधी ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की भी घोषणा की थी जिसके कारण मीरजापुर में भी हजारों लोग सड़क पर निकल आए तथा उन दुकानों का घेराव भी किया जहां विदेशी वस्तुएं बिकती थीं। सविनय अवज्ञा आन्दोलन तत्कालीन राजनीतिक वातावरण में एक अभिनव प्रयोग था। यथार्थ में गांन्धी जी महसूसते थे कि हमारा सहयोग ही अंग्रेजों को भारत पर काबिज होने में मददगार रहा है। गांधी दूरदर्शी थे तथा हजारों साल की भारतीय गुलामी के इतिहास ने उन्हें सिखा दिया था कि बिना भारतीयों के सहयोग से न तो कुतुबुद्दीन ऐबक स्थापित हो सकता था, न
ही अंग्रेज या अकबर, औरंगजेब। मुगल, तुर्क अफगान,अंग्रेज सभी ने भारतीयों की आपसी फूट का नाजायज लाभ उठाया था। कभी मराठा, अंग्रेजों का साथ दे रहा था तो कभी मुगलों का, अंग्रेजों ने दोनांे को प्रताड़ित व दमित किया। ऐसी स्थिति में हमारा काम होना चाहिए अंग्रेजों से असहयोग करना तथा जब असहयोग की धारणा नीचे से ऊपर तक यानि पूरी जनता में आ जाएगी फिर किसी भी तरह से अंग्रेज भारत में नहीं रह सकता।
मीरजापुर में कांग्रेस के बढ़ते प्रभाव को दबाने के लिए अंग्रेजों ने कांग्रेस कार्यालय को घेर लिया तथा उसे सीज कर दिया। वहां से प्राप्त रजिस्टर के आधार पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां की गईं। इस क्रम में उपेन्द्रनाथ बनर्जी तथा युसूफ इमाम को भी गिरफ्तार कर लिया गया। उस समय मीरजापुर में स्थापित स्कूलों में एक का नाम था ‘लन्दन मिशन स्कूल’ तथा दूसरे का नाम था सरकारी विघालय बरियाघाट जहां अंग्रेजी में पढ़ाई कराई जाती थी। स्वतंत्राता की भावना से ओत-प्रोत तमाम छात्रों ने अंग्रेजों के इन स्कूलों का बहिष्कार कर दिया इस कारण से कुछ महत्वपूर्ण छात्रों को गिरफ्तार भी कर लिया गया। जनपद में युवकों ने अपना एक अलग संगठन भी बना लिया था। व्यापारियों तथा औरतों ने भी संगठन के कार्यो में भाग लेना प्रारंभ कर दिया था। 19 फरवरी 1922 को रावटर््सगंज में व्यवसायियों की एक सभा आयोजित की गई तथा सभा में निर्णय लिया गया कि अंग्रेज अधिकारियों को रावटर््सगंज आने पर खाने-पीने का कोई सामान नहीं दिया जाएगा। जनपद का सारा आन्दोलन उस दिन स्थगित हो गया जिस दिन चौरा-चौरा की घटना के बाद गांधी जी ने आन्दोलन को वापस ले लिया। इस आन्दोलन के दौरान 38 लोगों को गिरफ्तार किया गया था पर इन गिरफ्तारियांे का जनता पर उतना व्यापक प्रभाव नहीं पड़ता था जितना कि हड़तालों, जुलूसों व
प्रदर्शनों का। दर असल हजारों साल से गुम-सुम बैठी जनता के लिए हड़ताल के नारे जुलुसों के उत्साह तथा प्रदर्शनों के साहस किसी विस्मयकारी परिघटना से कम न थे। जनता कौतुक में थी तथा अपनी कमजोरियों को परीक्षित कर रही थी कि अन्याय का विरोध किया ही जाना चाहिए। 1922 के आस-पास का सोनभद्र तथा मीरजापुर, जनतात्रिक अधिकारों तथा उनकी प्राप्ति के लिए किए जाने वाले विरोधों के प्रति सर्वथा अनभिज्ञ था। उस काल में विरोध का मतलब होता था हमला या सशस्त्रा संघर्ष, शान्तिपूर्ण ढंग से भी किसी अन्यायी व्यवस्था का विरोध किया जा सकता है यह वैचारिक स्तर पर पहले स्वीकार्य नहीं था, कमो-वेश आज भी शान्तिपूर्ण जनतांत्रिक विरोध का मुद्दा कुछ कथितअतिबादियांे के लिए हारे हुए लोगों का काम जान पड़ता है।
मीरजापुर व सोनभद्र पर बनारस के कांग्रेसी कार्यक्रमों का प्रभाव काफी व्यापक स्तर पर पड़ता था। बनारस में उस समय देश स्तर के स्वतंत्राता संग्राम सेनानी थे। पंडित मदन मोहन मालवीय, भगवान दास तथा शिवप्रसाद गुप्त स्वतंत्राता की लड़ाई में शीर्ष पर थे। इन लोगों के प्रभाव से बनारस में अंग्रेजों सरकार से असहयोग का आन्दोलन तेजी पर था। मीरजापुर व सोनभद्र भी बनारस से प्रभावित होकर आवेशित था।
असहयोग आन्दोलन का प्रभाव इतना पड़ा कि अंग्रेजों ने साइमन कमीशन की स्थापना कर दी। अंग्रेजों की यह एक अदूरदर्शी दमनात्मक रणनीति थी। असहयोग आन्दोलन स्थगित हो जाने के बाद थोड़ी सी स्थिरता आई थी तथा जन-आवेश ठंडा हुआ था, उसमंे साइमन कमीशन ने जलती आग में घी का काम किया। 3 फरवरी 1928 जिस दिन कमीशन को भारत में आना था उस दिन भारत भर में हड़ताल स्वस्फूर्त ढंग से आयोजित हो गई। मीरजापुर व सोनभद्र भी अप्रभावित नहीं रहा। मीरजापुर में साइमन कमीशन के विरोध में एक बहुत बड़ा जुलूस निकाला गया जो मीरजापुर की गलियों से गुजरता हुआ एक जगह आम सभा में तब्दील हो गया। जुलूस में लोग काला झन्डा लिए हुए थे तथा ‘साइमन वापस जाओ’ का नारा लगा रहे थे। इसके तत्काल बाद ही गांधी जी तथा जवाहर लाल नेहरू मीरजापुर आए। 4 मार्च 1929 को जवाहर लाल नेहरू की एक सभा चुनार में आयोजित की गई। इस सभा को नरेन्द्र देव तथा श्री प्रकाश ने संबोधित किया था। इस सभा के कारण मीरजापुर में स्वतंत्राता प्राप्ति के लिए जागरूकता व सक्रियता दोनों में तीव्रता आई। आठ महीने बाद 19 नवम्बर 1929 को गांधी जी का मीरजापुर रेलवे स्टेशन पर जोरदार स्वागत किया गया। स्वागत करने वालों में कागं्रेस व दूसरे हजारों स्वतंत्राता प्रेमी नागरिक थे। वहीं पर गांधी जी की एक आम-सभा भी हुई जिसमें लगभग दस हजार की जनता उपस्थित थी। गांधी जी को छह हजार से अधिक रूपयों की भंेट भी दी गई। 1930 के कांग्रेस कार्यालय के साथ कदम मिला कर चलने के लिए जनता का गांधी जी ने सभा में आह्वान किया तथा साइमन कमीशन का सार्थक विरोध करने के लिए मीरजापुर की जनता को धन्यवाद दिया। दोपहर बाद गांधी जी ने चुनार में एक सभा किया। चुनार की सभा में गांधी जी ने मीरजापुर की बातें दुहराई तथा वहां उन्हंे पांच सौ रूपये भंेट किए गए।
कांग्रेस द्वारा असहयोग एवं सविनय अवज्ञा आन्दोलन 1929 में ही दुबारा प्रारंभ कर दिया गया था। गांधी जी ने 6 अप्रैल 1930 को नमक कानून का उलंघन डांडी में करके सविनय अवज्ञा तथा असहयोग आन्दोलन का प्रारंभ कर दिया था जिसका तात्कालिक प्रभाव मीरजापुर पर भी पड़ा। सभी तहसीलों में संघर्ष समितियों का गठन किया गया तथा उन्हें नमक कानून तोड़ने के लिए प्रेरित किया जाने लगा। कांग्रेस के प्रभावी नेता जे.एन.विल्सन ने नमक कानून तोड़ने के कार्यक्रम का नेतृत्व मीरजापुर में किया। नमक बनाने का काम चील्ह, विन्ध्यचल, चुनार में प्रारंभ कर दिया गया। जून 1930 में मीरजापुर में भी नमक बनाया जाने लगा। मीरजापुर में नमक बनाने के साथ-साथ विदेशी सामानों के बहिष्कार का मामला काफी जोरदार ढंग से आन्दोलन का हिस्सा बन गया तथा इस आन्दोलन के साथ जनता की भागीदारी भी आशापूर्ण थी। अंग्रेजी स्कूलों तथा अंग्रेजी शिक्षा का विरोध व बहिष्कार ये दोनों ऐसे ठोस व मनोवैज्ञानिक कार्यक्रम थे जिससे जनता काफी प्रभावित हुई तथा अंग्रेजों के प्रति घृणा से भर गई। 12 अपै्रल 1931 को हंसापुर में किसानों ने एक विशाल सभा का आयोजन किया तथा सभा ने निर्णय लिया कि लगान की अदायगी घटे हुए दर पर ही की जाएगी। उसी साल अंग्रेजी सरकार ने लगान की दरें बढ़ा दिया था।
भगत सिंह को फांसी तथा मोती लाल नेहरू की मृत्यु पर मीरजापुर की एक सभा में शोक प्रस्ताव पास किया गया। सभा को टी.ए.के. सेरवानी ने संबोधित किया। 8 मई को पुरूषोत्तम दांस टंडन की सभा मीरजापुर में आयोजित की गई जिसमें लगभग छह हजार जनता उपस्थित थी। इस सभा में मदन मोहन मालवीय भी उपस्थित थे। सभा का मुख्य उद्देश्य था हर उस कार्यक्रम तथा उस कानून का जोरदार विरोध करना जो भारत को पूर्ण स्वतंत्राता देने के खिलाफ हो। सभा में मांग की गई कि हमें पूरी आजादी चाहिए खंण्डित नहीं, पूर्ण स्व-शासन, विदेशी मामला, सेना, अर्थ एवं वित्त सारा कुछ हमारा अपना होगा कुछ भी विदेशी नहीं। मीरजापुर की इस सभा की घोषणायें आने वाले दिनों में पूरे देश की मांग बन गईं। इसी सभा में सम्पूर्णनन्द जी द्वारा सम्पूर्ण अधिकार का राजनीतिक प्रस्ताव रखा गया जो सर्वसम्मत से स्वीकृत हो गया। एक प्रस्ताव किसानों की कठिनाइयों के बाबत भी पास किया गया जिसमें लगान घटाने की बात को मंजूरी दी गई तथा लगान के जन-हित कारी निर्धारण के लिए पुनर्निरीक्षण की मांग की गई।
मीरजापुर का प्रशासन कांग्रेस के स्वतंत्राता रक्षकों से इतना घबरा गया कि सैकड़ों लोगों को सजा सुना दिया तथा कइयों पर जुर्माना लाद दिया। जिला प्रशासन ने कूर दमन का सहारा लेकर आजादी के संघर्ष को दबाना चाहा था परन्तु परिणाम उल्टा निकला। जनता प्रशासन की प्रतिक्रिया में अपना अखबार निकालने लगी रणभेरी नामक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ हो गया। वह कहां से छपता था तथा कौन छापता था बहुत प्रयास करने के बाद भी प्रशासन को जानकारी नहीं मिल सकी। रणभेरी का प्रकाशन लगातार चार साल तक चलता रहा। असहयोग आन्दोलन भी बिना किसी बाहरी उत्प्रेरणा के स्वस्फूर्त ढंग से लगातार मई 1934 तक चलता रहा। यह तभी समाप्त हुआ जब गांधी जी ने विधान-सभाओं में कांग्रेस के लोगों का जाना स्वीकार कर लिया तथा उसे स्थगित कर दिया।
18 जुलाई तथा 22 जुलाई 1934 को गांधी जी का रेलवे स्टेशन पर जोरदार स्वागत किया गया जब वे कानपुर की यात्रा पर थे। स्टेशन पर लगभग पांच हजार लोगों ने गांधी जी का स्वागत किया। 1937 के सामान्य चुनाव में जिले ने भागीदारी किया। इस चुनाव के माध्यम से कांग्रेस का प्रभाव जनता में व्यापक हुआ। आजादी की चाहना का घर घर प्रचार हुआ। इस चुनाव में औरतों ने भी बढ़-चढ़ कर भागीदारी निभाया। 1939 के विश्व युद्ध में भारत के भागीदारी के सवाल पर प्रदेश की जनता द्वारा निर्वाचित कांग्रेसी सरकार ने इस्तीफा दे दिया। कांग्रेस ने विश्वयुद्ध में भारतीय सैनिकों के शामिल होने का विरोध किया था। कांग्रेस द्वारा सरकार से इस्तीफा दे देने के बाद विश्व-युद्ध के लिए एकत्रा किये जाने वाले धन-सग्रह के कार्यक्रम का विरोध जनता स्वतः करने लगी। मीरजापुर में अंग्रेजी सल्तनत का विरोध तेजी से प्रारंभ हो गया। इस सन्दर्भ में सैकड़ों जन-सभाएं आयोजित की गईं, हजारों पंफलेट वितरित किए गए। 1941 आते-आते तक विरोध का रूप सत्याग्रह में तब्दील हो गया। कांग्रेस कार्यकर्ता सत्याग्रह में बढ़-चढ़ कर भाग लेने लगे। जिले में लगभग तीन सौ लोगों को गिरफ्तार किया गया तथा उन्हें जेल भेजा गया उनके ऊपर जेल व जुर्माना दोनों सजाएं थोपी र्गइं। रफी अहमद किदवई ने मीरजापुर की एक सभा में पहली बार सार्वजनिक रूप से विश्व-युद्ध की अंग्रेजी नीतियों के विरोध में भाषण दिया तथा सुभाषचन्द्र बोस ने भी मीरजापुर आकर जनमत जगाने का काम किया। कहा जाना चाहिए कि मीरजापुर जितना पिछड़ा जनपद था आन्दोलन के मुद्दे पर कत्तई पिछड़ा न था। आजादी की लड़ाई में यदि मीरजापुर की भागीदारी महत्वपूर्ण न होती तो कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता यहां कभी न आते। गांधी जी से लेकर मालवीय जी तक सभी यहां आए तथा आन्दोलन के प्रति जागरूकता बढ़ाने का प्रयास किये। मीरजापुर भले ही अपनी आर्थिक परेश्शानियों से उलझा जनपद रहा हो पर देश की एकता व अखंडता तथा स्वतंत्राता के लिए सदैव इसकी प्रतिबद्धताएं ऐतिहासिक महत्व की रही हैं मीरजापुर के साथ सोनभद्र का अन्तर्सबंध तो था ही।
14 जुलाई 1942 को सारा देश चिल्लाने लगा था ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ फिर 7 अगस्त 1942 को कांग्रेस पार्टी ने पूर्ण संघर्ष का नारा दिया जिसका लक्ष्य सवर्था अहिन्सात्मक था। गांधी जी के नेतृत्व में चला यह संघर्ष कई मायनों में पहले के जन-संघर्षों से भिन्न था। 1857 के विद्रोह की तर्ज पर यह शान्तिपूर्ण प्रजातांत्रिक विरोध था जिसमें निचले स्तर की जनता भी संघर्ष के साथ थी। 1857 के विद्रोह की तरह नहीं कि उसमें मध्यम वर्गीय समूह हिस्सा ले रहा था जिनके विशेष अवसर व सुविधाएं अंग्रेजों द्वारा छीन ली गई थीं। अंग्रेजों भारत छोड़ो किसी एक आदमी का नारा नहीं था यह छोटे बड़े सभी का साहसपूर्ण नारा था क्योंकि जनता समझ चुकी थी कि अंग्रेज बाहरी हैं तथा बाहरी हमारे ऊपर शासन नहीं कर सकते। असहयोग व सविनय अवज्ञा आन्दोलन तथा सत्याग्रह ने जनता को पूरी तरह से मानसिक रूपसे तैयार कर दिया था कि वे साहस पूर्वक अंग्रेजों का विरोध कर सकते हैं। अग्रं्रेजों के कानूनों की अवज्ञा करते हुए अपने विवेक व अपनी तर्कणा का उपयोग अपने व देश हित में कर सकते हैं।
असहयोग व सविनय अवज्ञा आन्दोलन के राजनीतिक अर्थों को उन्नीसवी सदी की दूसरी राजनीतिक स्थितियों के सन्दर्भ में तुलनात्मक ढंग से देखा जाय तो सारी दुनिया के उपनिवेशी देश अपनी स्वतंत्राता व संप्रभुता की लड़ाई लड़ रहे थे। उपनिवेशवादी साम्राज्य-शाहियां दुनिया के तमाम देशों पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर चुकी थीं। उस समय विरोध इन्हीं साम्राज्य-शाहियों के खिलाफ था। साम्राज्यवादी अंग्रेजी व्यवस्था तथा इसी के दूसरे समरूप देशांे ने दुनिया को पूंजी के रूप में रूपान्तरित करने का प्रयास तेज कर दिया था। इसी समय चर्च व राजसत्ता का षड़यंत्रापूर्ण गठ-जोड़ भी स्थापित हो जाता है तथा शासन व्यवस्था के लिए कठोर राजदण्डों का रवाका तैयार किया जाने लगता है। कहने को तो ब्रिटेन से राजशाही का मुकुट हट गया था तथा वहां सरकार की जिम्मेदारी जन-प्रतिनिधियों पर आ गई थी पर वह मात्रा मनोवैज्ञानिक सम्मोहन था। शासन-व्यवस्था की तांत्रिक साधना पद्धति राजशाही की ही कायम रही थी। राज्यों की कमजोर इच्छाशाक्ति के कारण शक्तिशाली तथा प्रभावशाली समाज की स्थापना के बजाय दुनिया में मुनाफा-खोरी, महाजनी, धोखाधड़ी, जाल-साजी जमाखोरी, सट्टेबाजी, रिश्वतखोरी अपराध और नैतिक पतन के बादल स्वतः हर तरफ मडराने लगे थेे। ऐसे ही समय में फ्रान्स की तर्कशील जनता 1789 में महान क्रान्ति कर देती है तथा सामन्ती सत्ता व सामाजिक आर्थिक बर्बर ढांचे को धूल में मिला देती है। 1789 के बाद 1799 में जब नेपोलियन फ्रांस पर सत्तारूढ़ होता है ठीक उसके बाद ही पूंजीवादी व्यवस्था का कथित जनतांत्रिक रूप दमनकारी अर्थ-प्रबंधन के रूप में बदलने लगता है। स्वतंत्राता, समानता, भ्रातृत्व का नारा धूल में मिला दिया जाता है तथा पूंजी का समाज व पूंजी का राज्य कायम कर दिया जाता है। उन्नीसवीं सदी के मध्य मार्क्स व एन्जेल भी महसूस करने लगे थे कि पंूजीवादी पश्चिमी सत्ता-व्यवस्था ने पारिवारिक व मान्य सामाजिक व्यवस्था से भावुकता को हटाकर उनमें विनाशकारी प्रतियोगिता उत्पन्न कर मनोवैज्ञानिक रूप से सारे सामाजिक संबधांे को मात्रा द्रव्य (पूंजी) संबधों में तब्दील कर दिया है। मार्क्स, एंजिल ने पहली बार 1844 की ‘आर्थिक दार्र्शानिक पांडुलिपियां’ में द्रव्य-संबधों के विनाशकारी परिणामों के प्रति सारी दुनिया को आगाह किया था। इसके महज चार साल बाद ही कम्युनिस्ट पार्टी का प्रसिद्ध घोषणा पत्रा 1848 प्रकाश में आया। जिसमें मार्क्स ने पूंजी के उन सूत्रों को सूत्राबद्ध किया जिससे दुनिया को पूरी तरह गर्त में धकेलने का प्रयास किया जा रहा था। ऐसा उस समय होता है जब लड़ाकू देश एक तरफा लड़ाईयों की तरफ बढ रहे थे तथा चाहते थे कि दूसरा देश शक्तिशाली न होने पाये। आज के सन्दर्भ में अमेरिका की यही स्थिति है। वह चाहे तो अफगानिस्तान पर हमला करे चाहे तो ईराक पर। इजराइल भी फिलिस्तिीन पर हमला करके संयुक्त राष्ट्र के औचित्य पर सवाल खड़ा कर रहा है। दरअसल कानून में सदा दोहरे मानदंड चला करते हैं। आज भी हम देख रहे है कि कानूनों के दोहरे मानदंड के कारण तथा भाषा के लिए अर्थो के कारण एकतरफे हमले किए जा रहे हैं तो दूसरी ओर दुनिया को बचाने की चिन्ता का प्रचार-प्रसार भी किया जा रहा है। मार्क्स ने सीधे रूप से माना कि पूंजीवादी व्यवस्था ने मनुष्य के वैयक्तिक मूल्य को ‘विनिमय मूल्य’ बना दिया है। इन्हीं स्थितियांे से संक्रमित तत्कालीन दुनिया के परिवेश में गांधी को विचारना व समझना होता है तथा निर्णाय लेना होता है क्या भारत सशस्त्रा क्रांति के जरिए आजाद हो सकता है?
जाहिर है कि गांधी ने सशस्त्रा क्रांति की जगह अहिन्सात्मक आन्दोलन का सूत्रापात किया जो सारी दुनिया के लिए राजनीतिक सत्ता प्राप्तियों का सर्वथा नया दर्शन था। असहयोग व अवज्ञा आन्दोलन तत्कालिक उपलब्धियों के सिद्धांत से अलग दूरगामी उपलब्धियों पर आधारित थे जिसका संबध मन मस्तिष्क तथा मिजाज से था। मन बदलेगा देश बदल जाएगा, तथा बन्दूकें सृष्टि का विकास नहीं कर सकतीं। बन्दूकें सिर्फ कुछ लोगों को मार सकती हैं पर कभी विचार की हत्या नहीं कर सकतीं। असहयोग व अवज्ञा आन्दोलन तथा सत्याग्रह के द्वारा देश स्तर पर स्वतंत्राता प्राप्ति की अनिवार्यता की इच्छा-शक्ति विकसित करने के लिए गांधी जी ने प्रयास किया था। गांधी जी जानते थे कि जब पृथ्वीराज की हत्या हो रही थी तब जयचन्द खुशियां मना रहा था। परमार्दिदेव की पराजय के समय सोलंकी मौन थे। राणाप्रताप जब अकबर से लड़ रहे थे तब दूसरे अकबर की चाटुकारिता में संलग्न थे। इस प्रकार युद्ध के मुकम्मल अन्तरविरोधों को गांधी जी भली भांति समझ रहे थे तथा जानते थे कि देश की भिन्न-भिन्न सांस्कृतिक स्थितियों में सबको बन्दूकी क्रांति के लिए एकजुट कर पाना आसान ही नहीं असंभव है। रूस की महान क्रांति भी हो चुकी थी वहां मेन्शेविक व बोलशेविक गुटों की घृणित प्रतिद्वन्दिता को गांधी युद्ध संस्कृति की स्वाभाविक परणति मानते थे। असहयोग व सनिवय अवज्ञा आन्दोलन ने जिस तरह से सोनभद्र को जागृत किया यह इतिहास के लिए एक जरूरी पाठ है क्यांेकि पूरा सोनभद्र हजारों साल की नींद में था तथा कभी भी नींद से जागने की इसकी इच्छाशक्ति नहीं थी। 1857 का विद्रोह सैनिक तथा सशस्त्रा था, वह संघर्ष मध्यकाल की युद्ध-संस्कृति की तर्ज पर था सो वह सशस्त्रा संगठन की मांग करता था। उस तरह का सक्षम लड़ाकू संगठन कुंअर सिंह, लक्ष्मीबाई, बेगम हजरत महल लक्ष्मण सिंह आदि इकठ्ठा नहीं कर पाये फलस्वरूप अंग्रेजों ने उस संघर्ष को दमित कर दिया। रामगढ़ विजयगढ़ के लक्ष्मण सिंह के साथ सैकड़ों स्वतंत्राता रक्षकों का बलिदान इस तथ्य का गवाह है कि हिंसा के द्वारा सत्ता परिवर्तन की बात सुनिश्चित नहीं की जा सकती। असहयोग आन्दोलन के सन्दर्भ में गजेटियर लिखता है...those two leaders of Tribals Jura and Budhhu bhagat are diefied
leaders. वस्तुतः मीरजापुर के चारों तरफ सत्याग्रह का प्रारंभ हो गया। लोग बाग सड़कों पर निकल जाते,लेट जाते, धरना प्रदर्शन करते तथा प्रशासन के कार्यो को वाधित कर देते। नरायनपुर, कछवां, वैझा, सीखड़, कैलहट, गैपुरा, जिगिना, रामगढ़, परासी, रावटर््सगंज सभी जगहों पर सत्याग्रह प्रारंभ हो गया। सत्याग्रह पूरी तरह अहिंसात्मक रूप से चलने लगा। इसके लिए हर जगह टोलियां बनाई गईं तथा इसे सुबह से लेकर अधेरा होने तक संचालित किया जाता रहा। सत्याग्रह उन्हीं जगहों पर हिंसात्मक रूप में बदल जाता जहां प्रशासन की तरफ से कांग्रेस कार्यकर्ताओं को परेशान या प्रताड़ित किया जाता। अहरौरा बाजार में सत्याग्रहियों के शान्तिपूर्ण सत्याग्रह पर पुलिस ने 13 अगस्त 1942 को गोली चला दी, जिससे दो व्यक्ति घटना स्थल पर ही मारे गए तथा ढेर सारे घायल हुए। अंग्रेजों अफसरों के तानाशाही दमन से परेशान हो कर स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने पहाड़ा स्टेशन पर आग लगा दिया जिसमें पांच लोगों की मौके पर ही हत्या कर दी गई। पूरे चुनार क्षेत्रा में 17 अगस्त 1942 के दिन को शोक दिवस के रूप में मनाया गया। ‘बैझा’ में भी अंग्रेजी पुलिस से पांच लोग गंभीर रूप से चोटिल हुए। अहरौरा, पहाड़ा तथा बैझा की घटनाएं अंग्रेजी पुलिस व सैनिकों की ऐसी दुर्दान्त कार्यवाहियों थीं जिससे शासक व शासित के परस्पर सम्बन्ध तथा राजदंड व जनता के अधिकार के दमन पर प्रकाश पड़ता है। शासन हर छोटे मोटे कार्य के लिए राजदंड का सहारा लेता है तथा जनता को दमित करने के लिए अपने हितानुसार भिन्न-भिन्न क्रूर संरचना के कानूनों का उत्पादन करता है बिना परवाह किए कि जनता का कानून के प्रति क्या पक्ष है? पूरे अगस्त माह सन् 1942 तक सोनभद्र अंग्रेजी प्रशासन द्वारा दमित व प्रताड़ित होता रहा। अंग्रेजों ने 1857 के स्वतंत्राता संघर्ष से सबक लेते हुए 1919 तक रोलेट एक्ट पास कर लिया था तथा इस एक्ट के आधार पर स्वतंत्राता संघर्ष के स्वयं सेवकों के दमन का व्यापक अधिकार भी हासिल कर लिया था। सामान्य रूप से भी देखा जाये तो अंग्रेजों द्वारा बनाए गए तमाम कानून आज भी अप्रासंगिक हैं पर भारतीय सरकार क्यों खामोश है इसके बारे में सिर्फ कुछ सन्देहों को ही पैदा किया जा सकता है। डा. राम मनोहर लोहिया तो सी.आर.पी.सी. की धारा 144,151 सी.आर.पी.सी. को मनुष्यता विरोधी माना करते थे। इतना ही नहीं व्यक्ति-स्वतंत्राता के बारे में उनका मानना था कि भौगोलिक सीमाओं में व्यक्ति तो कैद किया जा सकता है किन्तु उसका विचार नहीं कैद किया जा सकता सो भौगोलिक सीमांए विश्व-बन्घुत्व स्थापना के लिए हमेशा खुली रखनी चाहिए नहीं तो विश्ववंधुत्व का क्या मतलब? जिले में उल्लेखनीय आकड़ों के अनुसार 600 लोगों को गिरफ्तार किया गया तथा सजा दे गई। पर ये स्वतंत्राता सेनानी न तो रोए न गिड़गिड़ाए सभी ने हंसकर तथा कुछ क्रोधजन्य अभद्रता करके गिरफ्तारियों दे दीं। 1942 में एक लाख रूपयों तक का जुर्मना भी स्वतंत्राता सेनानियों से वसूल किया गया तथा इसी के बराबर की सरकारी सम्पत्ति की भी क्षति हुई।
1942 ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो आन्दोलन’ के बन्दी भारतीयों को जनरल चुनाव 1946 के पहले अंग्रेजों ने छोड़ दिया था। फिर कांग्रेस ने चुनाव में हिस्सा लिया। कांग्रेस को भारी सफलता मिली। इस सफलता में स्वतंत्राता प्राप्ति की आश्वयक खुशबू तथा गमक थी। एक बहुत बड़े दुखान्त नाटक के साथ पाकिस्तान को अंग्रेजों ने 14 अगस्त को ही स्वतंत्रा घोषित कर दिया, 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्राता मिली। 15 अगस्त 1947 की स्वतंत्राता की तारीख में सैकड़ों साल का उत्साह मिला हुआ था तो 14 अगस्त 1947 की तारीख को दिमाग को दिल से या दिल से दिमाग को अलग किया जा चुका था तथा हम अंग्रेजों द्वारा खण्डित भारत को पा रहे थे। हमारी अखंडता को जाते-जाते अंग्रेज तोड़ गए जो आज तक सिर दर्द बना हुआ है। क्या हम आज तक अंग्रेजों की तोड़ो, बाटों, फोड़ो की राजनीति समझ पाये हैं? संभवतः नहीं। लेकिन समझना ही होगा किसी न किसी दिन फिर वह दिन इतिहास का सबसे खूबसूरत दिन होगा आइए उस दिन की तरफ बढं़े।

