युद्ध-कालीन अतीत से अलग
नई सभ्यता व संस्कृति की तरफ एक छलांग-----यानि चतुर्थ भाग
सोनभद्र की ऐतिहासिक आधुनिकता बनारसी राज-व्यवस्था से जितनी जुड़ी हुई थी, उतनी ही अंग्रेजी शासन व्यवस्था से। राजाओं-जमीनदारों के राज-गाथाओं से अलग अंग्रेजों ने सोनभद्र में नई जमीनदारी व भूमि-व्यवस्था को स्थापित किया। इस नई भूमि-व्यवस्था का उद्घोष हालांकि जन-कल्याणकारी था तथा साफ-साफ दिखता भी था पर अंग्रेजों की दृष्टि इस कार्य में अंग्रेजी सल्तनत की सुरक्षा की अधिक थी। अंग्रेजों के पहले बलवन्त सिंह सोनभद्र के विजयगढ़ व अगोरी का अधिग्रहण स्वयं को सुरक्षित रखने व मजबूत करने के लिए करते हैं क्योंकि उनके अपने स्वतः निर्मित तथा मुगलों द्वारा आरोपित अर्न्तविरोध थे। जहांगीर के समय ही अंग्रेज भारत आ चुके थे। सर टामस एक अंग्रेज अधिकारी जहांगीर से सोलहवीं सदी के प्रारंभ में ही भारत में व्यापार करने की अनुमति हासिल कर चुका था। दक्खिन के हिस्से में फ्रासीसी काबिज थे ही। बलवन्त सिंह के बनारस राज का अभ्युदय पतनशील मुगल सल्तनत के बादशाह मुहम्मद शाह के जमाने में होता हैं। उस काल में अवध की जागीरें बादशाह द्वारा मुर्तजा खान को प्रदान की जा चुकी थीं। बलवंत सिंह को 1738 में मुहम्मदशाह द्वारा राजा घोषित किया जा चुका था। उस काल में ही अवध की जागीरें बादशाह द्वारा मुर्तजा खान को प्रदान की जा चुकी थीं। बलवन्त सिंह अपनी राजधानी गंगापुर बनारस से 7 किमी उत्तर में स्थापित कर लेते हैं।
एक नये ऐतिासिक नायक बलवन्त सिंह का उदय
राजा बन जाने के बाद बलवन्त सिंह बादशाह के प्रति राजस्व अदायगी व वफादारी में किसी तरह की कोताही नहीं बरतते फलस्वरूप एक बड़े साम्राज्य के संस्थापक बन जाते हैं। बलवन्त सिंह को ऐतिहासिक सुयोग भी प्राप्त होता है उन्हें जागीर सौपने वाला सादत खान 1739 में मर जाता है। सादत खान की मृत्यु के बाद बलवन्त सिंह स्वयं शासक बन जाते हैं। जिनकी अपनी मनो-वाक्षित प्रभु-सत्ता होती है। महमूदशाह यानि तत्कालीन बादशाह की मृत्यु 1748 में हो जाती है। इसके पूर्व ही मुहम्मदशाह द्वारा सफदर जंग जो सादत खान का भतीजा था उसे सादत खान का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया जाता है। बादशाह अहमदशाह द्वारा 1748 में सफदर जंग को मुगल सल्तनत का वजीर भी नियुक्त कर दिया जाता है। सफदर जंग दिल्ली का वजीर होने के कारण अवध की सुपुर्दगारी व जागीरदारी की
जिम्मेदारियों से दूर रहने लगा था। यह बलवन्त सिंह के लिए सोने में सुहागा था सो बलवन्त सिंह ने राज्य विस्तार करना प्रारंभ कर दिया। इसके पहले ही भदोही के मौनस जमीनदारों ने बलवन्त सिंह को अपना संप्रभु स्वीकार कर ही लिया था।
सफदर जंग की विवशता राजा बलवन्त ंिसह के लिए फायदेमन्द थी सो वे जान-बूझ कर अपने ऊपर आरोपित राजस्व की अदायगी नहीं कर रहे थे। सफदर जंग दिल्ली के अन्तविरोधों में फंसा हुआ था पर बलवन्त सिंह जानते थे कि किसी न किसी दिन सफदर जंग वापस आएगा तथा उन पर बकाया सारा राजस्व वसूल करेगा या तो रियासत तहस-नहस करेगा। चतुर- नीतिज्ञ की तरह 1751-52 में ही बलवन्त सिंह ने सोनभद्र के विजयगढ़ दुर्ग की खोज कर लिया था तथा सुनिश्चित कर लिया था कि सारे माल-असबाब विजयगढ़ दुर्ग में ही रखे जाएगें जो ऊँची पहाड़ी पर स्थित है तथा सुरक्षित भी।
1752 में बलवन्त सिंह ने इलाहाबाद के डिप्टी गवर्नर अलीकुली खान को पराजित कर दिया इसी के साथ अवध के नवाब के खजाने में राजस्व देना भी बन्द कर दिया क्योंकि सफदर जंग के दुश्मन बादशाह अहमदशाह के विरोध में उठ खड़े हुए थे सो सफदर जंग दिल्ली की सल्तनत बचाने में परेशान तथा उलझा हुआ था। सफदर जंग की उलझी हुई स्थितियां एक ऐसा अवसर थीं जिसका बलवन्त सिंह लाभ उठा सकते थे सो उनका पहला लक्ष्य था किसी भी प्रकार से बिजयगढ़ दुर्ग पर अधिकार स्थापित करना। बलवन्त सिंह का दूसरा लक्ष्य था सफदर जंग की निगरानी करना कि वह दिल्ली से कब उबरता है तथा अवध की तरफ कब वापस आता है?
बलवन्त सिंह का बिजयगढ़ दुर्ग अभियान
विजयगढ़ दुर्ग पर अधिकार कर पाना आसान नहीं था। इस कार्य के लिए बलवन्त सिंह को पहले चुनार व अहरौरा के मध्य में पड़ने वाले छोटे दुर्ग पटिहटा को जीतना होता फिर बनारस के 24 मील दक्षिण कुप्सा के पास वाले लतीफपुर को भी जीतना होता। लतीफपुर तथा पटिहटा के किले छोटे-छोटे सामन्तों के अधीन थे जो सीधे नवाब से जुड़े हुए थे। पटिहटा का दुर्ग जमायत खान द्वारा बनवाया गया था जो भागवत परगना का जमीनदार था। 1752 में बलवन्त सिह ने पटिहटा (अहरौरा और चुनार मार्ग के मध्य) पर एक बड़ी सेना के साथ आक्रमण कर दिया तथा उसे जीत लिया। पटिहटा की जीत के बाद बलवन्त सिंह ने लतीफपुर की तरफ प्रस्थान किया। लतीफपुर का किला काफी मजबूत था तथा मल्लिक फारूख के नियत्रंाण में था। मल्लिक की जमीनदारी कई मीलों में फैली हुई थी। संयोग से 1753 में लतीफपुर के शासक की मृत्यु हो जाती है। मल्लिक की मृत्यु के बाद उसका छोटा बेटा मल्लिक अहम्मद अहरौरा के पास के किले में रहने लगता है। सबसे पहले बलवन्त सिंह उसे पराजित करते हैं तथा वह मारा जाता है। मल्लिक अहमद की मृत्यु का समाचार सुनकर बड़ा भाई मल्लिक अहसन लतीफपुर को छोड़कर गाजीपुर जिले के जमानिया की तरफ पलायन कर जाता है इस तरह से बलवन्त सिंह को बिना किसी युद्ध के लतीफपुर हासिल हो जाता है। उन्हें मात्रा मल्लिक अहमद से ही युद्ध करना पड़ता है। इन जीतों के बाद विजयगढ़ दुर्ग का सपना बलवन्त सिंह के लिए यथार्थ बनता जा रहा था।
सोनभद्र के स्थानीय बड़हर, बिजयगढ़, अगोरी के चन्देल शासकों व सिगरौली के बेनवंशियों का युद्ध-कालीन भारत की युद्धगत परिस्थितियों से कभी सामना ही नहीं हुआ था। लगातार चार सौ साल से चन्देल राजा अपनी परिस्थितियों में ही अपनी संप्रभुत्ता की परिभाषाएं रचने में मगन थे सो वे युद्ध की अनिवार्यता से अपरिचित थे तथा उन्हें आशंका भी न थी कि बनारस का राजा लतीफपुर व पटिहटा को पराजित करके घनघोर जंगल की तरफ आएगा। सोनभद्र के राजाओं को कन्तित राज या कि रींवा राज से कोई खतरा नहीं था उधर बिहार के पलामू तथा नगर के भुइंया जमीनदारों से भी कोई आशंका नहीं थी। अचानक बनारस के राजा बलवन्त सिंह का बनारस के दक्षिण की तरफ विजय अभियान के लिए निकलना यह एक ऐसा समय था जो बनारस पर काबिज पुराने अधिपतियों पर सवाल खड़ा करता है। इसका उत्तर संभवतः इस तथ्य में निहित हो कि गहरवारों का बनारस पर अधिपत्य हो जाने के बाद मीरजापुर का कन्तित,श् शक्तेषगढ़, अगोरी, विजयगढ़, गहरवारों की कृपा से हमलों से विमुक्त हो गए हों क्योंकि चन्देल व गहरवार कहीं न कहीं शादी-ब्याह के रिश्तों से भी जुड़े हुए थे। बारहवीं सदी की राजपूती दुश्मनी भी उन दो शासक वंशों के लिए एक पाठ थी दुश्मनी के कारण दोनों को कहीं न कहीं पराजित हेाना पड़ा था।
बलवन्त सिंह का किसी भी तरह से राजपूत शासकों से कोई संबध न था। वे ब्राहमण मूल के भूमिहार थे सो उनके लिए मुसलमान शासक ही नहीं राजपूत शासक भी एक समान थे तथा दोनों से युद्ध का रिश्ता रखने में उन्हें किसी भी प्रकार की मनोवैज्ञानिक कुंठा न थी तथा विजयगढ़ पर अधिकार जमा कर वहां अपना माल असबाब रखना भी उनके हित में था। किले को खजाना बनाना उनकी जरूरत थी, क्योंकि बिजयगढ़ किले के समान सुरक्षित कोई भी दुर्ग उनके अधीन नहीं था। सो विजयगढ़ की जीत के लिए अभियान पर निकलना उनके लिए अनिवार्य था।
सोनभद्र के चन्देल शासक बलवन्त सिंह के दक्षिण विजयअभियान से काफी डरे हुुुुए थे। विजयगढ़ दुर्ग पर बलवन्त सिंह को युद्ध का सामना नहीं करना पड़ता गजेटियर बताता है कि बहुत ही सहजता से विजयगढ़ दुर्ग बलवन्त सिंह को हस्तगत हो गया था। बलवन्त सिंह ने विजयगढ़ दुर्ग के किलेदार को कुछ रूपया घूस में देकर किले को हासिल कर लिया था। इतिहासकार मोती चन्द्र इसे सौदा कहते हैं जो पचास हजार रुपयों में तय हुआ था। यह पचास हजार भी बाद में बलवन्त सिंह ने किसी को नहीं दिया। विजयगढ़, अगोरी के अलावा सिंगरौली की रियासत जो बिजयगढ़ से काफी दूर तथा दुर्गम स्थान पर थी वहां का राजा स्वतः बलवन्त सिंह से मिला तथा उन्हें रियासत का जरूरी राजस्व देना कबूल कर लिया। सिंगरौली की तरफ बढ़ना बलवन्त सिंह के लिए वैसे भी अनिवार्य नहीं था क्योंकि वहां रहकर वे बनारस की गति-विधियों की देख-रेख नहीं कर सकते थे। बनारस की देख-रेख करना तथा सफदरजंग के बारे में सूचनाएं हासिल करना यह विजयगढ़ से थोड़ा सुविधा-जनक था।
बलवन्त सिंह का सोनभद्र तथा सोनभद्र के दक्षिण में साम्राज्य स्थापित हो गया, इस प्रकार सोनभद्र बलवन्त सिंह के साम्राज्य का एक निर्णायक भाग बन गया।
सफदर जंग दिल्ली में जीवन तथा मृत्यु के खेल में फंसा हुआ था। दिल्ली सम्राट से जब सफदर जंग के रिश्ते सामान्य हो गए तब वह बनारस के राजा को परेशान व पराजित करने के अभियान पर निकल पड़ा। सफदर जंग 17 फरवरी 1754 को बनारस आया। बलवन्त सिंह बनारस से भाग कर चन्दौली पहुंच गए। इसी दौरान मराठांे ने दिल्ली पर हमला कर दिया दूसरी तरफ से इमादुलमल्क ने भी दिल्ली पर हमला कर दिया। सफदर जंग को दिल्ली का बुलावा आ गया तथा उसने बनारस से ही दिल्ली के लिए प्रस्थान कर दिया। यह बलवन्त सिंह के स्वयंभू शासन के लिए अच्छा सुयोग था। इस प्रकार सफदर जंग का भूत बलवन्त सिंह के लिए एक बार फिर टल गया। सफदरजंग की मृत्यु 5 अक्टूबर 1754 में हो गयी। सफदरजंग का पुत्रा शुजाउद्दौला उसका उत्तराधिकारी बना। शुजाउद्दौला के लिए बलवन्त सिंह से बकाए राजस्व की वसूली का मामला बहुत गंभीर व महत्वपूर्ण था। शुजाउद्दौला के लिए समय बहुत ही अस्थिरता का था। तमाम जागीरदारों ने राजस्व की अदायगी देना बन्द कर दिया था। ऐसी स्थिति में बलवन्त सिंह से बकाया राजस्व वसूली कर लेने का मुद्दा पूरे प्रान्त के लिए शुजाउद्दौला के राज-प्रबन्ध के पक्ष में होता फिर तो दूसरे छोटे-छोटे सामन्त तब स्वयं ही बकाया राजस्व चुकता कर देते। बनारस के राजा पर हमला करने के लिए चुनार का किला जीतना अति आवश्यक था। चुनार की आवश्यकता महसूस कर शुजाउद्दौला ने चुनार की तरफ प्रस्थान किया, बलवन्त सिंह की रणनीति थी कि नवाब शुजाउद्दौला से युद्ध न हो सिर्फ कूटनीति का सहारा लिया जाये सो बलवन्त सिंह ने चुनार के किलेदार को एक लाख रूपया देकर शुजाउद्दौला से युद्ध करने के लिए बहकाया। बलवन्त सिंह का यह योजना सफल नहीं हुई और शुजाउद्दौला चुनार किले पर काबिज हो गया। चुनार फतह के बाद शुजाउद्दौला ने बलवन्त सिंह की तरफ प्रस्थान किया किन्तु बलवन्त सिंह तब तक बनारस से लतीफपुर किले की तरफ कूच कर चुके थे। शुजाउद्दौला ने गाजीपुर के फौजदार फाजिल अली खान को निर्देशित किया कि वे बलवन्त सिंह का पीछा करे। बनारस के शेख अली हाजिर ने शुजाउद्दौला को एक अच्छी सलाह दिया कि बनारस के राजा बलवन्त सिंह से इस समय युद्ध करना सफल रणनीति नहीं होगी पर शुजाउद्दौला ने जवानी की जोश में शेख अली के प्रस्ताव को ठुकरा दिया तथा फाजिल अली से बनारस के राजा को पराजित करने का मन्सौदा बना लिया। फाजिल अली ने बनारस राजा जैसे अधिकारों को हासिल करने का अधिकार भी नवाब से मांगा। इसी बीच अहमदशाह अब्दाली के दिल्ली पर हमले ने शुजाउद्दौला को बलवन्त सिहं से अच्छा संबंध बनाए रखने के लिए विवश कर दिया। इस प्रकार बलवन्त सिंह फरवरी-मार्च 1757 तक के लिए नवाब के हमले से सुरक्षित बच गए।
बलवन्त सिंह कूटनीतिज्ञ साम्राज्यवादी थे। कन्तित के राजा की जमीनदारी भी बलवन्त सिंह ने 1759-60 मंे कुली खान से हासिल कर लिया। कन्तित के राजा विक्रम जीत सिंह राजस्व की भरपाई नहीं कर पाते थे सो कुली खान ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। राजा बलवन्त सिंह ने विक्रम जीत सिंह का राजस्व चुकता करके उन्हें भी कुली खान से छुड़वा लिया तथा कन्तित पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया।
शुजाउद्दौला की बक्सर युद्ध में हार होती है। शुजाउद्दौला के साथ शाह आलम तथा मीर कासिम की सेनाएं भी युद्ध में हिस्सा लेती हैं। बक्सर में अंग्रेजों से पराजित होने के बाद शुजाउद्दौला चुनार आ जाता है। वहां का रक्षक सिदी मुहम्मद बशीर खान नवाब को सलाह देता है कि वे सैनिक संगठन बनाएं तथा अंग्रेजों से युद्ध करें। नवाब शुजाउद्दौला को अपने उस फैसले पर काफी दुःख हुआ जिसके कारण उसनेे बलवन्त सिंह को परेशान करना चाहा था तथा शेख अली हाजिर की सलाह को खारिज कर दिया था। शुजाउद्दौला के मंत्राी बेनी बहादुर ने नवाब तथा अंग्रेजांे के बीच सुलह कराने का प्रयास किया किन्तु वह सफल नहीं हुआ।
अंग्रेज शुजाउद्दौला की निगरानी कर रहे थे तथा बलवन्त सिंह अंग्रेज व नवाब दोनों को देख रहे थे कि इन दोनों के संघर्ष से इतिहास की धारा किस तरफ मुड़ती है? शुजाउद्दौला तथा अंग्रेज दोनों के लिए चुनार का किला अनिवार्य बना रहता है। अंग्रेजांे के लिए चुनार तक पहुंचना आसान नहीं था सो अंग्रेजों ने बलवन्त सिंह से समझौता करना चाहा। बादशाह शाहआलम तथा बलवन्त सिंह से सहयोग का विश्वास लेकर अंग्रेज शासक मुनरो ने 29 नवम्बर 1764 को चुनार से तीन किलोमीटर दूर एक बगीचे में कैम्प डाल दिया। मुनरों ने कैम्प करने के पहले ही बादशाह शाहआलम से चुनार के अधि-ग्रहण अधिकार का आज्ञा पत्रा हासिल कर लिया था। किले का रक्षक मुहम्मद वशीर खान अंग्रेज मुनरो से किला छोड़ने के लिए सहमत भी हो गया लेकिन तब तक किले का दृश्श्य बदल चुका था। किले की रक्षक टुकड़ी के दो सरदार सिद्वी बलाल तथा सिद्वी नासिर ने मुहम्मद वर्शीर खान से बगावत कर दिया तथा किले से भगा दिया। उन्हें मालूम था कि अंग्रेजों ने शुजाउद्दौला को बक्सर में हरा दिया है। इस प्रकार मुनरो चुनार पर अधिकार जमाने में विफल हो गया।
अंग्रेजों ने चुनार फतह करने की फिर पूरी तैयारी की। बावजूद पूरी तैयारी के पचास अंग्रेज तथा एक हजार भारतीय अंग्रेज सिपाही मारे गए इसके अलावा भी अंग्रेजों का भारी नुकसान हुआ तब भी चुनार किले पर अंग्रेजों का अधिकार दिसम्बर 1764 तक नहीं हो पाया। उधर शुजाउद्दौला बनारस की तरफ प्रस्थान कर चुका था लेकिन अंग्रेजों ने उसके लिए व्यवधान उपस्थित कर उसे फैजाबाद की तरफ मोड़ दिया तथा जौनपुर को जीतते हुए अंग्रेज पुनः चुनार तक चले आए। क्यांेकि चुनार किला जीतना उनका महत्वपूर्ण व निर्णायक लक्ष्य था। चुनार का किला लम्बे समय तक अंग्रेजों के लिए सिरदर्द था। अंग्रेजों ने बादशाह शाहआलम से दुबारा प्रमाण पत्रा हासिल किया कि किला उन्हंे सौप दिया जाये पर किलेदार सिद्वी मुहम्मद बलेल ने साफ-साफ इनकार कर दिया कि ऐसा संभव नहीं है। उस समय किले में तीन हजार किले के बहादुर रक्षक सिपाही थे। किले की रक्षक टुकड़ी ने जिस इच्छा श्शक्ति व बहादुरी से अंग्रेजों का मुकाबिला किया था, उससे परेशान होकर अंग्रेज नहीं चाहते थे कि किले को हासिल करने के लिए युद्ध का सहारा लेना पड़े। अंग्रेज कूटनीतिक चालों से किले को हासिल करना चाहते थे। एक बार के पराजित अंग्रेज किसी भी तरह से किले की रक्षक सेना में विद्रोह भड़काना चाहते थे ऐसा हुआ भी। मजबूर होकर किलेदार सिद्वी बलाल को किला छोड़ना पड़ा इस प्रकार धोखा, छल व कूटनीतिक चालों से 8 फरवरी 1765 को चुनार का किला अंग्रेजों ने अपने अधीन कर लिया। चुनार का अंग्रेजों द्वारा अधिग्रहण इतिहास की महत्वपूर्ण घटना थी जिसका प्रभाव बनारस के राजा बलवन्त सिंह पर पड़ना था। शुजाउद्दौला से हालांकि बलवन्त सिंह से अच्छे संबध नहीं थे फिर भी राजा के साम्राज्यवादी विस्तार पर कोई फर्क पड़ने वाला नहीं था क्योंकि वह खुद अंग्रेजों से परेशान था तथा बच बचा कर भाग रहा था। बलवन्त सिंह की मृत्यु 23 अगस्त 1770 को हो जाती है।
बलवन्त सिंह की मृत्यु के बाद भी सोनभद्र पर कोई उल्लेखनीय प्रभाव नहीं पड़ता। बलवन्त सिंह की दूसरी राजपूत रानी से जन्मे चेतसिंह बनारस के राजा बन जाते हैं। राज परिवारों में हुकूमत के लिए होने वाला पारंपरिक संघर्ष महराज बनारस के राज परिवार में भी होता है पर सारे संघर्षों का उन्मूलन कर चेतसिंह राजा की गद्दी पर बैठ जाते हैं तथा बनारस राज की प्रजा को यह एहसास भी करा देते हैं कि वे ही बलवन्त सिंह के योग्य उत्तराधिकारी हैं। वैसे भी प्रजा कभी भी राज-व्यवस्था के उत्तराधिकारी के मामलों में दखल नहीं देती। प्रजा एक तरह से राज-व्यवस्था से दूर रहने वाली इकाई होती है जिसका कत्तई काम नहीं है कि वह राज-व्यवस्था में दखल दे। वैसे भी काल कोई हो प्रजा सत्ता-प्रबंधन के प्रति खामोश ही रहा करती है प्रजा की आज भी वही पुरानी सोच है।
23 अगस्त से 10 अक्टूबर तक का समय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी समय बनारस के उत्तराधिकार का मुद्दा राज परिवार में विचाराधीन था। 10 अक्टूबर 1770 को चेत सिंह का राज्याभिषेक होता है। चेतसिंह के राज्याभिषेक के बाद सोनभद्र के चन्देल या बेनवंशी राजाओं में एक मौन सहमति रहती है कि बनारस के राज-काज पर किसी प्रकार का दखल नहीं देना है। इस प्रकार सोनभद्र के राज वंश बनारस राज का मुखा-पेक्षी होने में कत्तई शर्मिन्दित नहीं होते। बलवन्त सिंह ने विजयगढ़ व अगोरी पर अपना आधिपत्य अवश्य स्थापित कर लिया था। पर सोनभद्र की तत्कालीन राज-व्यवस्था से सिवाय राजा बनने के कत्तई छेड़-छाड़ नहीं किया था। युद्ध-कालीन भारत के सत्ता-प्रभुओं की सर्वत्रा यही नीति थी कि स्थानीय शासन केन्द्रों को यदि कोई विशेष विपरीत परिस्थिति न हो तो उन्हें छिन्न-भिन्न या परिवर्तित न किया जाये। बलवन्त सिंह ने भी भारत के दूसरे साम्राज्यवादी शासकों की नकल करते हुए सोनभद्र के राज-वंशों के लिए किसी विपरीत प्रभाव का सृजन नहीं किया उन्हें जस के तस वैसे ही बने रहने दिया।
बलवन्त सिंह के आने तथा पूरे सोनभद्र पर काबिज होने के बाद सोनभद्र की
स्थानीय व्यवस्था चन्देल व बेनवंशी राजपूतों के अधीन ही थी तथा बलवन्त सिंह द्वारा निर्धारित राजस्व की अदायगी करना उन दोनों राजवंशांे ने स्वीकार कर लिया था। यही कारण था कि सोनभद्र के शासक गण बनारस की तरफ आंखे गड़ाये हुए थे कि वहां क्या होता है? बनारस पर चेत सिंह का राज्याभिषेक हो जाता है,अब बलवन्त सिंह के स्थान पर चेत सिंह का शासन तंत्रा सोनभद्र पर प्रभावी हो जाता है। 1775 को अंग्रेजों ने चेतसिंह के अधिकारों में कटौती करते हुए उनके तमाम दीवानी व फौजदारी अधिकारों को संकुचित कर दिया। इसका प्रभाव सोनभद्र व मीरजापुर पर पड़ा। अंग्रेजांे द्वारा चेतसिंह के अधिकारों का संकुचित किया जाना सोनभद्र व मीरजापुर के छोटे-छोटे सत्ता प्रभुओं के लिए अच्छी खबर थी तथा वे सोचने लगे थे कि अंग्रेजों से सीधा रिश्ता बनाया जाये, चेत सिंह से भले अंग्रेज हैं। चेतसिंह से अंग्रेजों ने 2266180 बाइस लाख छाछठ हजार एक सौ अस्सी सिक्कों की मांग की थी लेकिन चेतसिंह ने उसका भुगतान नहीं किया तथा टाल-मटोल की नीति अपनाते रहे थे। अन्त में 1781 ई को चेत सिंह ने साफ तौर से इनकार कर दिया कि वे सिक्कों का भुगतान करने में समर्थ नहीं हैं। अंग्रेजांे ने चेतसिंह के इनकार का अर्थ लगाया कि चेत सिंह अंग्रेजी सरकार से बगावत कर रहा है तथा अपने पिता बलवन्त सिंह की तरह लगान अदायगी को फंसा कर रखना चाहता है। दूसरा अर्थ यह था कि चेत सिंह का राज्य छोटा भी नहीं है उसके अनुसार 2266180 का सिक्का चुकता करना कोई कठिन नही है।
वारेन हेस्टिंग्स तब गर्वनर जनरल था तथा दूसरे गर्वनर जनरलों से काफी भिन्न भी था। बंगाल में मिली सफलता से वह आवेश में था। जैसे को तैसा की नीति का अनु-पालक। वारेन हेस्टिंग्स ने बनारस राज-परिवार के अर्न्तविरोधों तथा कलहों का पता लगाया तथा उन अर्न्तविरोधों का उभारने का काम भी किया। वारेन हेस्टिंग्स को बनारस में अपना सत्ता केन्द्र स्थापित नहीं करना था उसे तो वफादर व आज्ञाकारी राजा की आवश्यकता थी जो बतौर राजा का कार्य करे तथा उसे राजस्व देता रहे। भारत में स्थानीय संप्रभुओं को सत्ता सौंपने की रणनीति अंग्रेजों ने इजाद नहीं किया था, यह नीति तो सल्तनत काल से लेकर मुगल काल तक चलती रही थी। अकबर,अलाउद्दीन,औरंगजेब तथा अंग्रेजों ने पुरानी नीति का अनुसरण किया तथा क्षेत्राीय संप्रभुओं को लगान (राजस्व) वसूली तथा भूमि प्रबन्ध का एक तरफा व मन-माना अधिकार दिया जिससे केन्द्रीय सत्ता-प्रतिष्ठान मालामाल रहे।
1781 से ही वारेन हेस्टिंग्स ने चेत सिंह को पराजित तथा पद स्थापित करना
अंग्रेजी व्यवस्था का प्राथमिक लक्ष्य बना लिया था। सो वारेन हेस्टिंग्स ने बनारस में डेरा डाल दिया तथा चेतसिंह को उनके बनारस स्थिति किले में कैद करवा लिया। चेतसिंह को कैद करवाना वारेन हेस्टिंग्स ने हंसी का खेल समझा था जो उसके लिए काफी भारी पड़ा। बनारस की प्रजा ने राजा का साथ दिया तथा अंग्रेजी सेना को इतना क्षतिग्रस्त किया कि अंग्रेजों को चुनार के लिए भागना पड़ा। वारेन हेस्टिंग्स को चुनार में भी शान्ति न मिली। चुनार किले की सुरक्षित टुकड़ी ने वारेन हेस्टिंग्स की सेना को वहां से भी भागने पर मजबूर कर दिया।
बिजय गढ़ किले पर अंग्रेजी जैक
वारेन हेस्टिंग्स ने शुजाउद्दौला की सेना को बक्सर में हराया था वही बनारस तथा चुनार आकर बुरी तरह पराजित होता है। अपनी शर्मनाक पराजय से वारेन हेस्टिंग्स चिड़-चिड़ा हो जाता है। चेतसिंह को पराजित करने के लिए वह कानपुर, इलाहाबाद आदि की अंग्रेजी सेनाओं को आमंत्रित करता है तथा चेत सिंह पर सुयक्त हमला करने की रणनीति बनाता है। चेतसिंह बनारस किला छोड़कर लतीफपुर के किले की तरफ कूच कर देते हैं। इधर वारेन हेस्टिंग्स की सेना उन्हें ढॅूढती हुई वहां पहुंचती है। लतीफपुर में चेतसिंह एक बड़ी सेना का संगठन तैयार करते हैं जिसमें स्थाई तथा अस्थाई सैनिक लगभग 22000 (बाइस हजार) होते हैं। राजा की सुरक्षित सेना इससे अलग होती है।
अंग्रेजी सेना के लिए चेतसिंह को पराजित करना प्राथमिक व अनिवार्य मुद्दा था। पर चेतसिंह इतने सरल तरीके से पराजित नहीं किए जा सकते थे। अंग्रेजों की सेना को बाधित करने के लिए सीखड़ के जमीनदार साहब खान भी मोर्चा संभाल लेते हैं तथा पटिहटा के जमीनदार भी उठ खड़े होते हैं। लेकिन अंग्रेजों की संयुक्त सेना कहीं रूकती नहीं उसे तो चेत सिंह को हर हाल में पराजित करना था। अंग्रेजों ने आक्रमण नीति के तहत एक बड़ी सेना के साथ ‘पटिहटा’ पर हमला बोल दिया ‘पटिहटा’ ध्वस्त हुआ। यहां लड़ाई महज कुछ दिनों तक चली जिसमें अंग्रेजों को कम क्षति उठानी पड़ी। 15 सितम्बर 1781 से लेकर कुछ दिन आगे तक पटिहटा में पटिहटा के जमीनदार अंग्रेजी सेना से जीवन मृत्यु का खेल खेलते रहे थे। इसी दौरान चेत सिंह विजयगढ़ किले की तरफ पलायन कर जाते हैं।
अंग्रेजी सेना का मात्रा एक मकसद था विजयगढ़ किले का अधिग्रहण। चेतसिंह विजयगढ़ से होते हुए अपने माल असबाब के साथ रींवा की तरफ भाग जाते है। जहां बनारस राज को जीत लेने की पूरी कोशिश करते हैं। रींवा के महादजी सिन्धिया ने चेत सिंह को आश्वस्त भी किया था पर चेत सिंह रीवंा प्रवास के दौरान अंग्रेजों के खिलाफ किसी करागर योजना को क्रियान्वित करने में सफल नहीं हो पाते। 1811 में चेत सिंह की मृत्यु हो जाती है। 1781 में ही विजयगढ़ किले पर अंग्रेज किले की खिड़की की तरफ से हमला करते हैं और जीत लेते हैं। विजयगढ़ किले पर हमला करने के पहले वारेन हेस्टिंग्स स्थानीय मतभेदों की जानकारी हासिल करता है। विजयगढ़ राज से असंतुष्ट कुछ चन्देलों ने ही वारेन वारेन हेस्टिंग्सकी सेना की पहुच किले तक करवाया था। बहुत ही सहजता से अंग्रेजों ने बिजयगढ. किले पर काबिज होने का सपना पाल लिया था किन्तु बिजयगढ़ किले पर पहुंचते ही अंग्रेजों को स्थानीय आदिवासियों से युद्ध करना पड़ा। स्थानीय आदिवासी कमाण्डर नहीं चाहते थे कि किला अंग्रेजों के अधिकार में चला जाये। आदिवासियों ने तीर धनुष से अंग्रेजों का सामना किया। दन्त कथा है कि लगभग तीन सौ धांगर व चेरो जनजाति के लोग किले की सुरक्षा करते हुए वहां शहीद हो गए। के पिछले हिस्से से हमला करती है तथा किले को ध्वस्त कर देती है तथा काफी लूट-पाट करती है।
विजयगढ़ किले की पराजय सोनभद्र के लिए बहुत बड़ी हार थी फिर तो अंग्रेजों को यहां कुछ करना ही नहीं पड़ा। 1781 में विजयगढ़ किले का पतन होता है, ऐसा नहीं कि वारेन हेस्टिंग्स की सेना चोरी से यहां आती है तथा हमला करती है वह लगातार सितम्बर 1781 तक चेतसिंह का पीछा कर रही था। पहले बनारस फिर चुनार, सीखड़, पटिहटा आदि से होते हुए अंग्रेजी सेना सुकृत के रास्ते की तरफ से विजयगढ़ तक आती है सवाल है कि उस समय शक्तेषगढ़ व कन्तित या विजयगढ़ राज के शासक क्या कर रहे थे? उधर रींवा के लोग कहां थे जहंा चेत सिंह को जाकर शरण लेनी पड़ती है फिर सिंगरौली के राजा चुप क्यों थे? कोई उत्तर नहीं।
इन सवालों के उत्तर सत्राहवीं सदी मंेे कत्तई महत्वपूर्ण नहीं थे। दर-असल उस समय के सत्ता प्रभुओं के लिए मर्यादा या वैभव की बात न थी कि पड़ोसी राजा पराजित न हो चाहे पड़ोसी राजा भले ही पराजित हो जाये पर उनके विशेषाधिकार सुरक्षित रहें। विशेषाधिकारों की सुरक्षा तथा विशेष अवसरों की तलाश या निर्मिति ही तत्कालीन सत्ता केन्द्रों की कार्य योजना थी। एकतरफा तथा स्वान्तः सुखाय जैसा कोई भी कार्य व्यापक प्रभावों वाला नहीं होता। स्थानीय सत्ता-प्रतिष्ठानों का अपने तक ही सीमित रहना, अंग्रेजों के सत्ता केन्द्रों की स्थापनाओं का प्रमुख कारण रहा है जिसके कारण ही अंग्रेजों का प्रभुत्व भारत के अधिकांश भू-भागों पर स्थापित हो गया।
सत्राहवीं सदी के अन्त तथा अठारहवीं सदी के प्रारंभ का काल सत्ता-केन्द्रों के सहयोग तथा सद्भाव का काल कत्तई नहीं था। एकोअहं की राज-व्यवस्था से निर्मित सत्ता-प्रतिष्श्ठान धड़ाधड़ टूटते जा रहे थे और अंग्रेज उन पर काबिज होते जा रहे थे। हमें बलवन्त सिंह तथा चेत सिंह के पराभव काल का सन्दर्भ अंग्रेजों की दूसरी लड़ाईयों से निश्चित रूप से लेना चाहिए। सितम्बर 1781 में विजयगढ़ किले पर अंग्रेजों का आधिपत्य हो जाता है तथा 30 सितम्बर 1781 को बनारस राज की व्यवस्था महीप नारायण सिंह के जिम्मे अंग्रेजों द्वारा लगा दी जाती है। और सोनभद
तथा मीरजापुर की पुरानी राजव्यवस्था को जिसे बलवन्त सिंह ने समाप्त कर अपने बनारस राज में मिला लिया था उन्हें अंग्रेज बहाल कर देते हैं। सोनभद्र की अगोरी
बिजयगढ़ रियासतें अंग्रेजों द्वारा बहाल कर दी जाती हैं।
1781 के आस-पास भारत की दूसरी रियासतों में क्या हो रहा था? अंग्रेज राजनीतिक कौतुक करने में माहिर थे। 1746 से लेकर 1748 तक लगातार अंग्रेज दूसरी समानान्तर ताकत फ्रांन्सीसियों से युद्ध कर रहे थे। 1748 से लेकर 1754 तक दुबारा फिर अंग्रेज फ्रांन्सीसियों से युद्धरत हो गए। मामला था हैदराबाद व कर्नाटक राज्यों का पतन। दोनों चाहते थे कि उनकी सत्ता स्थापित हो जाये किन्तु 1755 में वे आपस में सुलह कर लेते हैं। सन्धि अधिक दिन तक नहीं चल पाती फिर तीसरी बार अंग्रेज तथा फ्रांन्सीसी युद्ध के लिए आमने-सामने हो जाते हैं। 1760 में अंग्रेज फ्रांन्सीसियों को ‘वांडिवाश’ के युद्ध में निर्णायक पराजय देते हैं। इस प्रकार भारत के दक्षिणी राज्य,अंग्रेजों के लिए अपने राज्य बन जाते हैं।
अंग्रेज दक्षिण के बाद बंगाल पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लेते हैं। वहां के नवाब सिराजूद्दौला को अपदस्थ करने में मीरजाफर की मदत करते हैं तथा उसे बाद में बंगाल राज्य का नवाब बनाते हैं। मीरजाफर 1759 में नवाब का पद अख्तियार कर लेता है तथा सिराजूद्दौला मीरजाफर के पुत्रा द्वारा युद्ध में मारा जाता है। इसी मीरजाफर को अंग्रेजों ने 1760 में पदच्युत कर दिया तथा उसके दामाद मीर कासिम को बंगाल की नवाबी साैंप दी। मीर कासिम अंग्रेजों से सावधान था तथा वह बंगाल की प्रगति करना चाहता था इसलिए उसने सेना का एक मजूबत संगठन भी बनाया तथा उसका सेनापति एक जर्मन को नियुक्त किया। मीर कासिम अन्त तक अंग्रेजों से लड़ता रहा, सो अंग्रेजों ने उसे बंगाल की नवाबी से हटाकर दुबारा मीरजाफर को नवाब बना दिया। यह वही मीरजाफर था जो सिराजूद्दौला का सेनापति था तथा पलासी युद्ध 1757 में नवाब को धोखा दिया तथा खामोश हो गया था दूसरी तरफ अंग्रेज सैनिक एक तरफा हमला कर रहे थे फलस्वरूप सिराजूद्दौला वहीं मारा गया। अंग्रेजी सेना से लड़ने के लिए मीर कासिम ने बादशाह शाहआलम तथा अवध के नवाब शुजाउद्दौला का सहयोग लेकर एक संघ बनाया लेकिन यह संघ 1764 में बक्सर युद्ध में अंग्रेजों से हार गया। बक्सर की हार से बंगाल अंग्रेजांे के अधीन चला गया और शुजाउद्दौला का अवध भी अंग्रेजों के प्रभाव में आ गया। अवध के नवाब शुजाउद्दौला को मजबूर होकर अंग्रेजों से सन्घि करनी पड़ी इस सन्धि में बादशाह शाहआलम भी एक पक्षकार था। यह संधि ‘इलाहाबाद की सन्धि’ के नाम से ज्ञात है। मुगल सम्राट ने अंग्रेजों को बंगाल, बिहार व उड़ीसा की दीवानी (राजस्व वसूलने का अधिकार) अधिकार दे दिया तथा अंग्रेजों ने शाहआलम (बादशाह) को 26 लाख रूपये वार्षिक पेंशन तथा ‘कड़ा’ व इलाहाबाद का जिला देना स्वीकार किया। अंग्रेजों ने कड़ा तथा इलाहाबाद को अवध के नवाब शुजाउद्दौला से छीना था। 1765 में इलाहाबाद की सन्धि होती है जो अंग्रेजों के लिए इतिहास का सर्वथा नया अध्याय बन जाती है। इसके बाद अंग्रेजों ने बनारस राजा को पराजित करने की रणनीति बना ली तथा चेतसिंह पर राजस्व वसूली का कष्टकर दबाब भी बना लिया फिर ऐसा क्या था कि अंग्रेजों ने अवध के नवाब शुजाउद्दौला को बक्सर में पराजित करने के बाद अवध को बंगाल की तरह अंग्रेजी राज में क्यों नहीं मिला लिया? इतिहास के लिए एक महत्वपूर्ण सवाल है जिसका उत्तर अंग्रेजों की कूटनीतिक दूर-दर्शिता में निहित था। अंग्रेज, मराठा तथा निजाम का सहयोग लेकर दक्षिण के हैदर अली को पराजित करना चाहते थे। विजयनगर का शक्तिशाली साम्राज्य तालीकोट के युद्ध 1565 के बाद काफी छिन्न-भिन्न हो गया था। दक्षिण भारत में सिर्फ मैसूर, हैदराबाद तथा मराठा राज ही प्रभावशाली रह गये थे। अंग्रेजों ने कूटनीति का सहारा लेकर निजाम व मराठा राज से सैनिक सन्धि कर ली। मराठा सदैव अवध पर हमला किया करते थे सो अंग्रेजी राज में मिलाने के लिए मराठों से संघर्ष लेना ठीक न था तथा अवध को अंग्रेजी राज में मिलाने के लिए मराठों से भी उन्हें संघर्ष करना पड़ता। यही कारण था कि अंग्रेजों ने अवध को छोड़ दिया था।
अंग्रेजों के लिए जितना बनारस की पराजय आवश्यक थी उसमें कम मैसूर की पराजय नहीं थी। विजयगढ़ किले से चेत सिंह का पलायन सितम्बर 1781 में होता है। उधर चेतसिंह के पूर्व मैसूर राज्य से अंग्रेज दो बार युद्ध कर चुके होते हैं। पहला युद्ध 1768-69 में तथा दूसरा 1780-84 में। पहले युद्ध में मराठा तथा निजाम ने हैदर अली का साथ दिया। हैदरअली ने बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से मराठा व निजाम को मिला लिया जबकि उनकी सैनिक संधि अंग्रेजों से थी। अंग्रेज व हैदर अली की ही सेनाएं युद्ध में लड़ीं। हैदर अली ने बहुत ही चुतराई तथा बुद्धिमानी से अंग्रेजों को परास्त किया। हैदर अली ने एक ऐसी ऐतिहासिक विवशता खड़ी कर दी कि अंग्रेजों को हैदर अली से सन्धि करने के लिए विवश होना पड़ा। वह सन्धि 1 अप्रैल को हुई जिसके आधार पर जीते हुए भागों को एक दूसरे को वापस करना था तथा एक दूसरे के सहयोग की भी शर्त थी कि किसी पर भी हमला होगा वे एक दूसरे का साथ देंगे।
मराठों ने 1771 में हैदर अली मैसूर पर आक्रमण कर दिया तथा अंग्रेजों ने सन्धि के अनुसार हैदर अली का साथ नहीं दिया। हैदर अली को अंग्रेजों की दगाबाजी पर क्रोधित होना स्वाभाविक था सो हैदर अली ने कनार्टक (अंग्रेजों राज्य) पर आक्रमण कर दिया फलस्वरूप अंग्रेज भी हैदर अली के विरूद्ध हो गए। 1780 से लेकर 1782 तक लगातार हैदर अली युद्धगत सफलताएं हासिल कर रहा था इसी बीच उसकी मृत्यु 1782 में हो जाती है। हैदर अली के बाद उसके पुत्रा टीपू सुल्तान की 17 मार्च 1784 को मंगलोर में अंग्रेजों से सन्धि होती है पर यह सन्धि 1789 में अंग्रेजों द्वारा तोड़ दी जाती है। 1789 में टीपू सुल्तान त्रावणकोर के राजा (अंग्रेजों का पक्षधर) पर हमला कर देता है। अंग्रेज त्रावणकोर के पक्ष मंे थे सो अंग्रेजों ने टीपू सुल्तान से सन्धि की शर्ते तोड़ कर युद्ध करना आरंभ कर दिया। पहले की तरह इस बार अंग्रेजों ने मराठा तथा निजाम को अपनी ओर मिला लिया। अंग्रेजों की बड़ी ताकत से युद्ध करना संभव न था तथा हैदर अली की तरह टीपू सुल्तान निजाम व मराठों को अपनी तरह न मिला सका सो टीपू सुल्तान ने विवश होकर अंग्रेजों से सन्धि कर लिया। 1792 तक मैसूर राज्य का पूरी तरह से पतन हो गया तथा उस राज्य के हिस्से को मराठा, निजाम व अंग्रेजी राज में मिला लिया गया।
1780-82 के आस-पास मराठा भी अंग्रेजों से लड़ रहे थे पर 1782 में ‘सालवाइर्’ की सन्धि मराठों व अंग्रेजों के बीच होती है इधर महीप नारायण सिंह का 30 सितम्बर 1781 को राज्याभिषेक होता है। जिस समय चेतसिंह का पतन होता है वह काल अंग्रेजों के साम्राज्य के अभ्युदय का काल बन जाता है। अवध के नवाब शुजाउद्दौला से सन्धि, बनारस का पतन तथा मराठों से ‘सालीबाई’ की सन्धि तथा बंगाल पर अंग्रेजी राज की स्थापना। पूरे दक्षिण भारत पर प्रभुत्व स्थापित कर लेने के बाद अंग्रेज पूरे भारत पर आधिपत्य स्थापित कर लेने का सपना देखने लगे थे। ऐसी स्थिति में बनारस के चेतसिंह का साथ कौन देता? क्या राजा रींवा या कि मराठा, कौन अंग्रेजांे से लड़ता? वैसे महाद जी सिन्धिया खुद परेशान थे हालांकि मराठा सामन्तों में सिन्धिया व होल्कर दोनों शक्तिशाली थे। होल्कर की सेना ने 1802 में पेशवा व
सिंन्धिया दोनों की संयुक्त सेना को पराजित कर दिया। अब सिन्धिया विवश थे उधर पेशवा ने अंग्रेजों से सन्धि कर ली जिसके प्रयास मंे अंगेज बेलजली बहुत पहले से ही लगा हुआ था। चेतसिंह विजयगढ़ से भाग कर महादजी सिन्धिया से सलाह मशविरा कर एक बड़ी सेना का संगठन करना चाहते थे पर जब पेशवा ने अंग्रेजों से सन्धि कर ली फिर तो उनके पास कोई विकल्प न था। महादजी सिन्धिया तथा भोसले दोनों को अंग्रेज 1803 में पराजित कर देते हैं तथा इनके अलावा दूसरे मराठा सामन्त गायकवाड व होल्कर दोनों इस युद्ध के प्रति उदासीन बने रहते हैं। महादजी सिन्धिया ने भी विवश होकर 1803 में अंग्रेजों से सन्धि कर ली तथा सन्धि के अनुसार सिन्धिया को गंगा व यमुना का पूरा क्षेत्रा अंग्रेजों के लिए छोड़ना पड़ा।
चेतसिंह के पास समकालीन ऐतिहासिक परिवेश में कोई राजनीतिक विकल्प न था। 1803 में सिन्धिया द्वारा अंग्रेजों से सन्धि किया जाना चेतसिंह के लिए काफी दुखद था। 1803 के आस पास अंग्रेजों ने उत्तर भारत के अलीगढ़ दिल्ली व आगरा पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया था। चेत सिंह की रणनीति थी कि मराठों से मिलकर तथा अवध के नवाब के साथ सन्धि करके अंग्रेजों पर हमला किया जाये पर अंग्रेज हर तरफ से जीत रहे थे। अन्ततः 1811 में चेतसिंह की मृत्यु हो जाती है।
बनारस का राज अंग्रेजों की अनुकंपा से महीपनारायण सिंह के नेतृत्व में चलने लगता है। फलस्वरूप पूरा जनपद मीरजापुर, सोनभद्र के साथ उनके नियंत्राण में चला जाता है और सोनभद्र की अगोरी, बिजयगढ़ तथा बड़हर की राजव्यवस्था पहले की तरह चलने लगती है बनारस राज के अधीन। राजा महीपनारायण सिंह को अंग्रेज नाममात्रा का राज प्रमुख नियुक्त करते हैं क्योंकि पूरा प्रशासनिक दायित्व उनके पिता दुर्ग विजय सिह पर रहता है। राजा पर चालीस लाख रूपये सालना का राजस्व निर्धारित किया गया था कि वे कपनी को देंगे। राजा के पास केवल राजस्व संग्रह का ही काम था तथा इसके लिए भी एक नायब तथा अंग्रेज रेजिडेन्ट को नियुक्त किया गया था। इस प्रकार बनारस का पूरा प्रशासन अंग्रेजों के अधीन हो गया था। वारेन हेस्टिंग्स ने राजा के लिए कुछ जागीरें छोड़ दी थीं जहां राजा को दीवानी अधिकार मिला हुआ था बाद में महीपनारायण सिंह के उत्तराधिकारी उदितनारायण सिंह ने अंग्रेजांे को मिलाकर पर्याप्त अधिकार 1826 तक हासिल कर लिया।
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