‘अस्तित्व की टकराहटें एवं सुरक्षा यानि इतिहास का मघ्य-काल’
तृतीय भाग
समय के संघातिक ऐतिहासिक दौर में जयचन्द्र के कन्नौज साम्राज्य का पराभव 1194 या इतिहास की वह संघटना है जिसका रूप आदिकाल से भिन्न है। 1194 इतिहास का वह दुखान्त पड़ाव एक ठहराव है जो इतिहास को दूसरे पाल्हे में डाल देता है। कहा जा सकता है कि साम्राज्यों के स्वर्गारोहण की साम्राज्यवादी विचार- धारा का विलोपन उस अर्थ में हो जाता है कि राजा गलत नहीं कर सकता चाहे हारे या जीते, शुद्ध अर्थो में राजा जब गलत करता है तब राजा से अधिक उसकी प्रजा को यातना झेलनी पड़ती है। हमें ध्यान रखना होगा तथा समझना होगा कि गहरवार (गहड़वार) राजा जयचन्द व चौहान राजा पृथ्वीराज के झगड़े क्यों थे, क्या थे अर्न्तविरोध? क्या उन दोनों में दोनों की अलग जनता (प्रजा) थी जो इतिहास के साम्राज्यवादी दांव-पंेचों को ध्वस्त कर सकती थी। कहना न होगा कि जयचन्द्र व पृथ्वीराज ये दोनों इतिहास की धारा मोड़ने वाले युद्ध के व्यवसायिक कलाकार थे क्यांेकि उस काल में युद्ध एक व्यवसाय तथा साम्राज्यशाहियों के लिए आतंककारी उद्यम था। युद्ध नहीं तो फिर क्या? यह मध्य-काल का प्रश्न था तो उत्तर भी। गंभीरता से विचार करें तो बीसवीं सदी के दोनों विश्व-युद्ध भी व्यवसाय व उद्यम की तरह ही जान पड़ते हैं। दुनिया आज जानती है कि बीसवीं सदी के दोनों विश्व-युद्ध भी व्यवसाय व उद्यम व साम्राज्यवादी हितों के लिए ही लड़े गये थे। विकसित देशों के लिए अनिवार्य था कि वे अपने उपनिवेशों की हिफाजत के लिए सारी दुनिया को युद्ध की विभिषिका में झोंक दंे। हमें इस सन्दर्भ में ध्यान रखना होगा कि दुनिया के सारे उपनिवेश चाहे वे ब्रिटिश, पुर्तगाल, स्पेन, फ्रांस किसी के भी अधीन रहे हों सभी स्वतंत्राता की पवित्रा आकांक्षाओं से छट-पटाते हुए आक्रोशित तथा आन्दोलन-रत थे। उप-निवेशों का आन्दोलन-रत होना तथा स्वतंत्राता प्राप्ति के लिए राजनीतिक विकल्पों व समाधानों की तलाश करना यह एक ऐसा जन-उभार था जिसे साम्राज्यवादी ताकतंे सत्ता-विरोध की श्रेणी में रखती हैं तथा अपने आज्ञाकारी सैनिकों पुलिसों तथा अन्य प्रशासनिक विधानों से जनता केआन्दोलन को हर हाल में दमित करने का उपक्रम करती हैं। ऐसा करना साम्राज्यवादी ताकतों के लिए बहुत आसान था, विश्वयुद्ध का रास्ता ढूंढना तथा उपनिवेशों में आपात-काल लगा कर उपनिवेशों को मिले सीमित अधिकारों को भी सीमित कर देना, नागरिक अधिकारों का समाप्त कर देना, जनता की सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक क्रिया-कलापों को बाधित करना या उसे समाप्त कर देना।
ग्यारहवीं शताब्दी का भारत राज-सत्ता के संदर्भ में स्थिर और शान्त नहीं था युद्ध की विभीषिका से जल रहा था तथा एक नया अध्याय रच रहा था, हारो या जीतो। युद्ध की वह संस्कृति वैदिक संस्कृति से सर्वथा भिन्न थी। यह संस्कृति जीत की आकांक्षा के साथ साथ शोषण व दमन तथा लाभ-हानि पर टिकी थी। ग्यारहवीं तथा बारहवीं सदी के विजेताओं का लक्ष्य केवल लाभ-हानि पर टिका हुआ था जो ईस्ट इन्डिया कंपनी के जीतों व हमलों से स्पष्ट है। कंपनी भाडे़ के सैनिकांे के सहयोग से युद्ध लड़ने की प्रवृत्ति भी विकसित कर चुकी थी। जयवन्द के साम्राज्य के पतन की सूचना तो तभी मिल गई थी जब बंगाल के शाशक साहिब उद्दीन घोरी का साम्राज्य उत्तर भारत की तरफ फैलने लगा था। ‘पाला’ साम्राज्य की तरह ही घोरी भी उत्तर भारत की ओर बढ़ रहा था पर उसका साम्राज्य सोन नदी के उत्तर की तरफ तक बाधित था। सोन नदी के उत्तर का पूरा परिक्षेत्रा अगोरी, बड़हर, बिजयगढ़ राज के अधीन था। एक तरफ घोरी का साम्राज्य विस्तारित हो रहा था तो दूसरी तरफ ब्याघा्र का साम्राज्य विस्तारित हो रहा था। उसी समय ब्याघ्रा ने सोनभद्र के एक स्थान कालपी से लेकर चुनार तक अपने अधीन घोषित कर दिया था। इस प्रकार उस समय दो साम्राज्य गति पकड़ रहे थे एक था ब्याघ्रा साम्राज्य तथा दूसरा था रानाका विजय कर्ण का। अभी तक ‘घोरी’ का साम्राज्य सोनभद्र तक न पहुंच पाया था जो उस काल-खण्ड का तीसरा शक्ति प्रतिष्ठान था।
तेरहवीं सदी तक संभव है ग्यारहवीं तथा बारहवीं सदी ही के आस-पास मीरजापुर के दक्षिण में जिसे सोनभद्र कहा जाता है राजपूतों के छोटे-छोटे राज्य स्थापित हो चुके थे। ‘कन्तित’ भी अलग राज्य के रूप में स्थापित था तथा कन्तित राज का ‘शक्तेषगढ’़
पर आधिपत्य हो चुका था तथा कोलों व भरों को विस्थापित भी किया जा चुका था। इधर सोनभद्र में एक नया राज समीकरण अगोरी-बड़हर तथा विजयगढ़ भी स्थापित हो चुका था। अगोरी-बडहर तथा विजयगढ़ के नये राज समीकरण के पहले यहां बालन्दशाह के वंशजों का राज स्थापित था जिसका विस्तार घोरावल के समीप बेलन तक, पूरब की तरफ पलामू तक, दक्षिण की तरफ सिंगरौली व मध्य प्रदेश के ‘सीधी’ ‘रीवा’ं
व ‘अम्बिकापुर’ के सीमान्त तक था। इस प्रकार ‘बालन्दशाह’ के वंशजों का सत्ता-प्रतिष्ठान हालांकि बहुत बड़ा नहीं था फिर भी बारहवीं सदी की ऐतिहासिक स्थितियों में छोटा भी न था। गजेटियर बताता है कि यह राज काफी समृद्धिशाली था। बालन्दशाह कौन था, उसका वंश किससे संबधित था? 1911 तथा 1974 का गजेटियर कुछ भी खुलासा नहीं करता। गजेटियर सोनभद्र या कि मीरजापुर की व्यवस्था को न तो पूरे भारत से जोड़ कर प्रदशित करता है न ही सोनभद्र को अलग से इसीलिए वह कुछ सूत्रों तथा भाषिक सूक्तियों के आधार पर ही विश्लेषण करता है।
‘रानाका विजयकर्ण, ‘घोरी’ तथा ‘व्याघ्रा’ के तीनों शक्ति प्रतिष्ठानों पर अन्ततः दिल्ली के ही अधिपति का नियंत्राण रहता है। इस हिसाब से देखा जाये तो जौनपुर स्वतंत्रा सत्ता के रूप में उभर चुका था। हमें ध्यान रखना होगा कि 1398 में तैमूरलंग का हमला होता है तथा भारत के प्रमुख क्षेत्रा पंजाब व दिल्ली ही नहीं मेरठ हरिद्वार,कटेहर आदि प्रभावित तथा प्रताड़ित होते हैं। आदि-काल का मैनेन्डर, गजनबी की तुलना में तैमूर लंग का हमला बहुत ही भयानक व हृदय विदारक था। तैमूर लंग इतिहास में युद्ध की सबसे घृणित व आपत्तिजनक संस्कृति के साथ भारत में दाखिल होता है। तैमूर लंग का हमला भारतीय शासकों के लिए विशेष पाठ की तरह होता है जिससे सभी आक्रान्त होते हैं पर भारतीय शासक उससे कुछ नहीं सीखते।
जयचन्द्र का शासन काल 1193 में समाप्त हो जाता है तथा 1203 में चन्देल राजा परमार्दिदेव कुतुबुद्दीन ऐबक से हार जाता है इस प्रकार से इन दो महत्वपूर्ण घटनाओं से भारतीय इतिहास का पूरा परिदृश्य ही बदल जाता है। राजपूती शासन व्यवस्था की आत्म-रक्षा प्रवृत्तियां उनके लिए आत्महंत्ता साबित होती हैं। पूरा स्थानीय प्रशासन आपसी कलह व रंजिश से छिन्न- भिन्न हो जाता है। 1193 तथा 1203 दो ऐसे वर्ष हैं जो 1206 महज तीन साल आगे बढ़कर एक नये साम्राज्य को पैदा कर देते हैं। 1206 में कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली के गौरव पूर्ण सिंहासन पर पदारूढ़ होता है। यहीं से इतिहास को एक धारा मिलती है तथा सूचना भी कि युद्धों पर आधारित इतिहास की गति-विधियों का कोई भविष्य नहीं होता यदि ऐसा होता तो कुतुबुद्दीन ऐवक जो एक गुलाम था कैसे दिल्ली के सिंहासन पर आरूढ़ हो जाता तथा गुलाम वंश की स्थापना कर पाता। दुनिया के इतिहास में किसी गुलाम का सत्तारूढ़ होना इतिहास की नपी-नपाई प्रवृत्तियों पर एक लम्बी बहस तथा सार्थक निष्कर्ष की मांग करता है।
सोनभद्र की स्थिति बारहवीं सदी में दिल्ली की शासन व्यवस्था से अप्रभावित रहती है क्योंकि दिल्ली के शासन व्यवस्था में अपने ही कारणों से अपुर में ‘मल्लिक सरवर ख्वाजा जहां’ की शासन-व्यवस्था स्थापित हो चुकी थी तथा उसने शर्की साम्राज्य (एक स्वतंत्रा साम्राज्य) की स्थापना कर लिया था। सोनभद्र शर्की के ही अधीन आ गया होगा या अनिश्चतता की स्थिति में रहा होगा।
गजेटियर बारहवीं सदी में बालन्दशाह के वंशजों का अगोरी विजयगढ़ पर एक समृद्ध शासन-व्यवस्था की सूचना देता है पर यह नहीं बताता कि बालन्दशाह कौन था? बालन्दशाह का वंश कहीं खैरवाह साम्राज्य की स्थापना करने वाले प्रताप धवल का ही तो नहीं था जिसका प्रभुत्व उधर पूरब में सासाराम, पलामू, भोजपुर तक था।
बालन्दशाह का रीवां के अधिपतियों से भी कोई सूत्रा प्रमाणित रूप से नहीं जुड़ता। इसके अलावा कन्तित या कि बनारस के राजाओं से भी बालन्दशाह के किसी रिश्ते का स्पष्ट या धुंधला प्रमाण भी नहीं मिलता।
बालन्दशाह कौन था तथा किस साम्राज्य का हिस्सा था यह जानना इतिहास की अनिवार्यता है क्योंकि विजयगढ़ व अगोरी दुर्ग दोनों न केवल पुरातत्व के नमूने हैं वरन स्पष्ट रूप से अपनी स्थिति स्पष्ट करते हैं कि इनका निर्माण किसी एक राजवंश ने कराया होगा तथा एक ही समय में कराया होगा। वास्तु-कला से यदि किलों के बारे में निष्कर्ष निकाला जाये तो यह स्पष्ट है कि इन किलों का निर्माण किसी छोटे-मोटे सामन्त या राजा के वश का नहीं था। ये किले आज भी खंडहर के रूप में खड़े हैं तथा प्रमाणित करते हैं कि इनका निर्माण किसी शक्तिशाली सत्ता प्रतिष्ठान ने ही कराया होगा।
समुद्रगुप्त ने चौथी सदी में जिस वन-राज्य की स्थापना की थी कहीं उस वन-राज से जुड़े ये दोनों किले तो न थे। हालांकि यह भी स्पष्ट है कि इनका निर्माण लगभग ग्यारहवीं, बारहवीं सदी के आस-पास ही हुआ होगा। एक संभावना यह भी है कि इन वन-राज्यों के लोग चौथी सदी से लेकर लगभग जयचन्द्र व परिमार्दिदेव के पतन तक अस्थिर ही रहे, कहीं कोई इनकी स्थिर व्यवस्था न थी सिवाय जपला के प्रतापधवल के। गजेटियर मानता है कि बारहवीं सदी में खैरवाला साम्राज्य सोनभद्र में स्थापित हो चुका था। इस प्रकार अब कोई सन्देह नहीं रह जाता कि बालन्दशाह खैरवाला साम्राज्य से ही जुड़ा हुआ था, हो सकता है कि प्रताप धवल का उत्तराधिकारी रहा हो। इस प्रकार सोनभद्र का परिक्षेत्रा व्याघ्रा, घोरी तथा रानाका विजयकर्ण के सत्ता प्रभावों से बिल्कुल ही अप्रभावित जान पड़ता है। जौनपुर के शर्की राजव्यवस्था से इसका जुड़ा होना भी सन्देह पूर्ण है क्योंकि सरवर ख्वाजा जहां के अपने ही अर्न्तविरोध थे। मल्लिक सरवर की मृत्यु (1399) में होती है तथा शर्की राज खुद दिल्ली से झगड़ रहा था, ऐसी विकट स्थिति में उसका साम्राज्यवादी होना तथा जौनपुर से बाहर निकलना काफी मुश्किल था। 1399 में सरवर ख्वाजा जहां का पुत मल्लिक मुबारक शाह शर्की राज का उत्तराधिकारी बनता है तथा मुबारक ‘शाह’ की उपाधि धारण करता है। मुबारक शाह को पराजित करने वाला उसका भाई इब्राहिम था जिसकी मृत्यु 1440 में हो जाती है। इस प्रकार शर्की राज-व्यवस्था 1394 से 1440 तक चलती है लगभग 46 साल तक।
तैमूर लंग का आक्रमण 1398 में होता है तथा तुगलक वंश का अन्तिम बादशाह महमूद तुगलक 1412 में मर जाता है। तैमूर लंग के हमले व लूट के कारण तुगलक वंश का प्रभुत्व वैसे भी कम हो जाता है तथा झगड़े का फायदा जौनपुर के शर्की राज को मिलता है जो 1440 तक चलता है। दिल्ली 1412 से लेकर 1526 लगातार लगभग 14 वर्ष तक अस्थिरता तथा अनिश्चतता के दौर से गुजरती रही। 1416 से लेकर 1526 तक दिल्ली के दो सत्ता प्रतिष्ठान ‘लोधी’ व ‘सैयद’ दिल्ली के बचे-खुचे साम्राज्य पर शासक बने रहते हैं। दिल्ली साम्राज्य मध्यदेश तथा दूसरे महत्व पूर्ण क्षेत्रों से सिकुड़ चुका था तथा केवल दिल्ली के आस-पास तक ही केन्द्रित हो गया था। लोधियों में सिकन्दर लोधी ने मध्यदेश पर नियंत्राण स्थापित करने के लिए इतिहास में पहली बार अपनी राजधानी आगरा में बनाया। सिकन्दर लोधी ने मध्यदेश के विजय अभियान के दौरान चुनार को जीतने का लक्ष्य बनाया जिससे शर्की राज के हुसैन को पराजित किया जा सके पर सिकन्दर के लिए चुनार का विजय लक्ष्य एक सपना ही बना रह गया था। शर्की हुसैन ने सिकन्दर का जबरदस्त विरोध किया
फलस्वरूप सिकन्दर लोधी को ‘बघेल’ व ‘भाटा’ राज्यों की तरफ मुड़ना पड़ा।
बारहवीं सदी से लेकर 1526 तक सोनभद्र लगभग पूरी तरह स्वतंत्रा सत्ता के रूप में अगोरी बड़हर व विजयगढ़ के राज समीकरण के अधीन स्थिर रहा। सोनभद्र में कही भी हमलावर स्थितियां नहीं थी। सोनभद्र में विजयगढ़,अगोरी व बड़हर राज का समीकरण किन कारणों से उभरा तथा वहां बालन्दशाह के स्थापित वंशजों का क्या हुआ यह इतिहास की समझ के लिए अनिवार्य तत्व है। विजयगढ़, बड़हर व अगोरी राज समीकरण की व्याख्या इतिहास के उन अर्न्तविरोधों में है जो जयचन्द्र व परमाद्रिदेव(चन्देल) के पतन का कारण बनते हैं। बारहवीं सदी से लेकर बाबर के आने के पूर्व तथा इब्राहिम लोदी के 1526 में पतन के बाद यादि लगभग तीन सौ साल तक पूरा मध्यदेश, म.प्र. तथा राजस्थान का सीमान्त छोटी-छोटी स्वतंत्रा रिसायतों के अधीन था। जयचन्द्र व परमाद्रिदेव के बाद भी चन्देल व गहरवार राजाओं के अस्तित्व समाप्त न हुए थे। क्योंकि दिल्ली में उथल-पुथल था तथा कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली पर पूरी तरह नियंत्राण स्थापित करने की चिन्ता में था। लोधी व तुगलक लड़ रहे थे। ज्ञातव्य है कि गुलाम वंश के बाद खिलजियों द्वारा तथा तुगलकों द्वारा दिल्ली को नियंत्रित किया जाने लगा था।
अगोरी, बड़हर तथा बिजयगढ़ रियासतों का आविर्भाव
बारहवीं सदी से लेकर तेरहवीं सदी का यह,वह दौर था जब चन्देल, चौहान तथा गहरवार अपनी संप्रभुत्ता के लिए आपस में लड़ रहे थे। जाहिर है पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु दूसरे चौहानों के लिए बदला लेने का पाठ थी तथा चन्देलों की उस समय की खामोशी, चौहानों के लिए एक वर्जना कि चन्देल भी कम नहीं। चन्देल, कालिंजर से बाहर निकलने के लिए छट-पटा रहे थे तथा उन्हें यह भी गुमान था कि उन्होंने कुतुबुद्दीन ऐबक को नसीहत भी सिखा दिया है। भले ही उनके वंश के राजा परमार्दिदेव उससे पराजित हो गए थे। फिर भी यह ऐतिहासिक सचाई है कि दो सौ साल तक लगातार चन्देल राज-व्यवस्था का संचालन करते रहे थे। उसी समय चन्देलों और चौहानों की बेतवा नदी के किनारे सत्ता प्राप्ति या सत्ता समापन का युद्ध होता है, यह युद्ध भयानक तो था ही और राजपूतों के आपसी संघर्ष का भी प्रमाण था। युद्ध में चन्देलों की चौहानों से बहुत बड़ी पराजय होती है। बेतवा नदी के किनारे की चन्देलों की चौहानों से परजय कई मायनों में कुतुबुद्दीन ऐबक की हार से बड़ी थी। बेतवा नदी के आस-पास चन्देलों व चौहानों के युद्ध को हिन्दू बनाम हिन्दू के या राजपूत बनाम राजपूत के युद्ध की तरह देखने का भी प्रयास किया जाना चाहिए तथा सन्दर्भ लेना चाहिए कि दिल्ली पर कुतुबुद्दीन ऐबक स्थापित हो चुका है, तथा जौनपुर में मल्लिक सरबर ख्वाजा जहां फिर इधर चौहानों तथा चन्देलों में क्या हो रहा था ? उस समय उनकी हिन्दू राष्ट्रीयता कहां थी? अशोक की अद्वितीयता कहां थी? सारा समीकरण जो आज बीसवीं सदी तथा इक्कीसवीं सदी को आन्दोलित किए हुए है कि हम राष्ट्र के बारे में सोचंे। राष्ट्रवाद का उभार जो 1857 में था वह बारहवीं शताब्दी में बहुत दूर की कौड़ी थी। बारहवीं शदी में तो अपना राज, अपना शासन का भाव था भले ही टुकड़ों में हो पर अपना राष्ट्र हो, शासन व्यवस्था छोटी हो या बड़ी यह महत्वपूर्ण नहीं महत्वपूर्ण था सत्ता में बने रहना। दसवीं सदी से लेकर बाबर व अकबर तक के पहले तक का काल छोटी-छोटी सीमान्त शक्तियों का काल था। जो जहां था वहीं स्वतंत्रा था तथा स्व-घोषित स्वतंत्राता भी हासिल किए हुए था। लगता है अतीत में जयचन्द्र के पराभव के बाद स्वतंत्रा-सत्ताओं के अभ्युदय का काल प्रारंभ हो गया था जो किसी काल में मगध, कन्नौज, पाटलिपुत्रा द्वारा स्थापित किया गया था तथा उनके साम्राज्यवादी विस्तार में था।
बारहवीं सदी से लेकर बाबर के पूर्व तक हम पाते हैं कि बौने व छोटे किस्म के सत्ता केन्द्रों में स्वतंत्राता की छट-पटाहटें तेज होने लगी थीं जिससे साम्राज्यवादी सत्ता के अर्न्तविरोध साफ-साफ उभरने लगे थे। बेतवा नदी के किनारे चन्देलों की हार तथा चौहानों की जीत को ही अंग्रेजों ने इतिहास का विषय बनाया तथा यह नहीं बताना चाहा कि वे आपस में क्यों लड़ गए? उनमें किस लिए संघर्ष था? इस बिन्दु पर अंग्रेजों का खामोश हो जाना इतिहास विवरण का षडयंत्रा है। दरअसल चन्देलों की हार तथा चौहानों की जीत तत्कालीन परिस्थितियों के लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं थी जितनी यह कि दिल्ली लड़ रही थी तथा आक्रान्त थी। वहां कोई शक्तिशाली राज्य व्यवस्था न थी। चन्देल, चौहान व गहरवार अपने-अपने राज हितों को लेकर अपनी पीठें ठोंक रहे थे कि वे बहादुर हैं तथा उनकी हुकूमतें फिलहाल दिल्ली के निशाने पर नहीं है। यह इतिहास की वह मनोभावना है जो साम्राज्यवादी ताकतों के डरों, भयों, आतंकों की तरफ इशारा करती हैं तथा हर सत्ता इकाई को भयग्रस्त बनाए रखती हैं जबकि सत्ता इकाई छोटी हो या बड़ी उसका स्वरूप देशी सांचे में भले ही न ढला हो पर बोली व भाषा की जातीय समरूपता तो उनमें पाई ही जाती है। ऐसी छोटी या बड़ी सत्ता इकाइयां सदैव स्वतंत्राता की पवित्रा चाहना के लिए प्रयास-रत रहा करती हैं। चन्देल चौहान तथा गहरवार राजाओं के अभ्युदय व पतन को भाषा की जातीय एकता व भिन्नता के आधार पर भी समझने का प्रयास किया जाना चाहिए।
बेतवां नदी के पास चौहानों तथा चन्देलों के युद्ध ने विजयगढ़ अगोरी व बडहर राज समीकरण का रास्ता प्रशस्त कर दिया। गजेटियर 1974 के मुताबिक एक ऐसी कहानी की जानकारी मिलती है जिससे सत्ता बदल का बहुत ही भोंडा रूप स्पष्ट होता है, सामन्यतया इतनी सहजता से सत्ता-पीठ का कोई वंश समाप्त नहीं हुआ करता। यहां तमाम सांस्कृतिक व नैतिक अपवादों से बचने की चिन्ता करते हुए सीधे तौर पर गजेटियर के तथ्यों का उल्लेख किया जाना अनिवार्य जान पड़ता है। गजेटियर विजयगढ़ अगोरी, बडहर राज समीकरण का प्रारंभ दो चन्देल सैनिक पारीमल व बारीमल से प्रमाणित करता है। बेतवां के युद्ध में चन्देल पराजित होते हैं, अनगिनत सैनिकों का वध होता है, स्वाभाविक है कि जो चन्देल सैनिक जीवित बच गए होंगे वे युद्ध-क्षेत्रा से पलायन किये होंगे। उन पलायित सैनिकों को गजेटियर भगोड़ा ;थ्नहपजपअमद्ध मानता है। पारीमल तथा बारीमल दो चन्देल सैनिक जो भगोड़े थे, यानि कि जीवन जीने की शाश्वत अभिलाषा से पलायन किए थे, वे भाग कर किसी तरह अगोरी राज तक आ जाते हैं। उनका अगोरी राज तक आना सोनभद्र के अतीत का पूर्णतया नया अध्याय बना जाता है। वे अगोरी राज के वैभव व समृद्धि का ज्ञान हासिल करते हैं तथा राज व्यवस्था में शरण की फरियाद करते हैं। उन्हें अगोरी राज, उदारता पूर्वक शरणार्थी की हैसियत प्रदान करता है। गजेटियर पारीमल तथा बारीमल को शरणार्थी का दर्जा नहीं देता बल्कि षडयंत्राकारी भाषा का प्रयोग करता है तथा उन्हें ‘पशु-पालन’ के काम पर नियुक्त होना सिद्ध करता है। वैसे तत्कालीन राजव्यवस्था में पशुधन की देख-रेख करना एक स्वतंत्रा प्रकार का जिम्मेवारी भरा कार्य था क्योंकि सैनिकों के सारे संसाधन घोड़ों, हाथियों पर निर्भर रहा करते थे। घोड़ों की सुरक्षा व देखभाल करना एक बहुत बड़ा काम था। इस प्रकार पारीमल व बारीमल दोनों भाई अगोरी राजव्यवस्था के प्रमुख अंग बन जाते हैं। निवर्तमान बडहर राज के वंशजों का मानना है कि पारीमल व बारीमल को अगोरी राज तब विजयगढ़ सहित का मंत्राी नियुक्त किया गया था। इतिहास की जानकारी के लिए यह महत्वपूर्ण नहीं है कि वे मंत्राी थे या पशु-पालक।
इतिहास आगे बढ़कर उस मोड़ पर परिवर्तित हो जाता है जहां बालन्दशाह के वंशज मदनशाह की सत्ता का अन्त हो जाता है। गजेटियर की कथा यहां बहुत ही संशय में है। गजेटियर भी सुनी सुनाई कथा का सहारा लेता है तथा वर्णन करता है कि मदनशाह बीमार था तथा उसका पुत्रा किसी युद्ध मंे हिस्सा लेने के लिए कहीं गया हुआ था। पुत्रा का नाम गजेटियर नहीं बताता न ही निवर्तमान विजयगढ़ या अगोरी बड़हर के वंशज ही मदनशाह के पुत्रा का नाम बता पाते हैं। मदनशाह चन्देल पारीमल व बारीमल को यह कार्य-भार सौंपता है कि वे उसकी बिमारी की सूचना उसके पुत्रा तक संप्रेषित करेंकृपर वे सूचना संप्रेषित नहीं करते। इस कथा से यह भ्रम पैदा होता है कि मदनशाह ने अपनी बिमारी की सूचना संप्रेषण का कार्य पारीमल व बारीमल को ही क्यों सौपा? क्या दूसरे महत्वपूर्ण अधिकारी नहीं थे?
इससे स्पष्ट हो जाता है कि तब तक पारीमल व बारीमल ने अगोरी विजयगढ़ राज व्यवस्था में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप स्थापित कर लिया होगा। मदनशाह की मृत्यु हो जाती है। मरने के पूर्व वह खजाने की चाभी भी पारीमल व बारीमल को सौप देता है। पारीमल व बारीमल मदनशाह का अन्तिम संस्कार करते हैं। मदन शाह के अन्तिम संस्कार हो जाने के बाद मदन शाह का पुत्रा अगोरी के लिए वापस होता है तथा पन्डा नदी के आस-पास अगोरी से लगभग तीस मील दूर अपना पड़ाव डालता है। दन्तश्रुति है मंडवास के राजा बालन्दशाह के वंश के हैं। उनके अनुसार पारीमल व बारीमल अगोरी की सेना साथ लेकर मदन शाह के पुत्रा अगोरी के राजकुमार को पंडा नदी के किनारे घेर लेते हैं तथा उसकी हत्या कर डालते हैं। इस कृत्य के पूर्व ही पारीमल व बारीमल स्वयं को स्वघोषित राजा घोषित कर चुके होते हैं। उस काल में इतिहास की ऐसी प्रवृत्ति थी भी।
निश्चित रूप से पारीमल व बारीमल ने अगोरी की राजव्यवस्था में मदन शाह के जीवित रहते ही अपना हस्तक्षेप सत्ता बदल की क्षमता तक तक बढ़ा लिया होगा। चन्देल बन्धुओं ने सबसे पहले अगोरी के राजकोष पर नियंत्राण स्थापित किया फिर राजा की उपाधि स्वतः ही ग्रहण की। इस प्रकार से सोनभद्र का सर्वश्रेष्ठ अगोरी बड़हर राज पहली बार राजपूतों के अधीन हो गया। ज्ञातव्य है कि हर्षवर्धन के काल के बाद दिल्ली के तोमर,अजमेर के चौहान, कन्नौज के गहरवार, मालवा के परमार, गुजरात के सोलंकी, बुन्देलखण्ड के चन्देल, बंगाल के पाल, ये प्रभावशाली राज्यों में तब्दील होने लगे थे किन्तु पृथ्वीराज चौहान तथा जयचन्द्र के परामव के कारण राजपूत रियासतें छिन्न-भिन्न होने लगी थीं। इनका रिश्ता दिल्ली से बहुत दूर का हो चुका था। इधर पारीमल तथा बारीमल जब अगोरी पर-अपना आधिपत्य जमा लिए फिर तो बुन्देलखण्ड के चन्देलों की श्रीवृद्धि ही हो गई। यह वही साल था 1203 का जब परिमार्दिदेव कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा हराये गए थे। अगोरी विजयगढ़ राज पर चन्देल बन्धुओं का राज्यारोहण इसी साल होता है।
बालन्द शाह के वंशज घाटम का अगोरी, बड़हर, बिजयगढ़
राज पर आक्रमण एवं राज्यारोहण
मदन शाह की मृत्यु सन् 1290 से अगोरी विजयगढ़ राज के पराभव का इतिहास एक बारगी बदल जाता है। इसे इतिहास की स्वाभाविक नियति कहा जाना चाहिए कि बारहवीं सदी में ही विजयगढ़ अगोरी राज्य को दो रूपों में तब्दील होना पड़ा। पहली बार शोकोत्सव में तो दूसरी बार विजयोत्सव में। शोक चन्देलों के लिए तो विजयोत्सव आदिवासी राजा बालन्द के वंशज ‘घाटम के लिए। घाटम बालन्दशाह तथा मदन शाह का उत्तराधिकारी था। घाटम ने मदन शाह की मृत्यु के बाद नये ढंग से किसी अज्ञात स्थान पर सेना का गठन किया। वह स्थान कहां था ? यह ज्ञात नहीं है। घाटम की सारी तैयारी कहां हो सकती थीं इसके बारे में ऐतिहासिक अनुमान किया जा सकता है कि प्रताप धवल सासाराम के रोहिताश्वगढ़ का जो खैरवाह साम्राज्य का संस्थापक था उसी के यहां घाटम ने चन्देलों से बदला लेने के बारे में सोचा होगा और उसके अनुसार तैयारी भी किया होगा। समुन्द्रगुप्त के बारे में स्पष्ट है कि उसने 18 राज्यों को मिलाकर ‘वन गणराज्य’ की स्थापना की थी। दिल्ली का परिदृश्य बहुत स्पष्ट नहीं था, कुतुबुद्दीन ऐबक 1210 में ही मर जाता है।(1296) में अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली का नया सुल्तान बनता हैं स्पष्ट है कि सोनभद्र बिहार के पलामू, सासाराम,भोजपुर आदि एक तरह से दिल्ली या कि कन्नौज या बुन्देलखण्ड की सत्ता-व्यवस्था से अप्रभावित था।कृदूसरी तरफ पलामू (झारखंड) पर चेरो राजवंश काबिज था। इस प्रकार से सोनभद्र का परिक्षेत्रा या तो प्रताप धवल के वंशजों के समीकरण में रहा होगा या तो ‘पाल’ वंश के। वैसे यह माना जाना चाहिए कि प्रताप धवल रोहिताश्वगढ़ के सहयोग से ही खैरवाह, घाटम ने विजयगढ़ अगोरी के चन्देल राजाओं पर हमला कर जीत हासिल किया होगा।
चन्देल उड़नदेव का घाटम पर आक्रमण एवं राज्यारोहण
गजेटियर ‘खैरवाह’ तथा ‘चन्देल’ युद्ध का बहुत ही भयनाक विवरण प्रस्तुत करता है। चन्देल राजवंश से जुड़े सारे लोगों की घाटम द्वारा हत्या करवा दी जाती है, कोई भी पुरुष उनमें जीवित नहीं बच पाता तथा अगोरी-विजयगढ़ पर घाटम का आधिपत्य हो जाता है। कभी-कभी संयोग भी इतिहास की पृष्ठभूमि तैयार करता है, वही हुआ अगोरी-विजयगढ़ राज के संबध में। घाटम के हमले से एक रानी सुरक्षित ढंग से किले से बाहर पलायन कर जाती है। वह गर्भवती रहती है। रानी के पलायन में उसकी दाई की महत्वपूर्ण भूमिका थी। रानी पलायन करते हुए विजयपुर राज की सीमा तक पहुंच जाती है तथा दाई के बहन के यहां रूकती है और वहीं एक बच्चे को जन्म देती है। गजेटियर बताता है कि दाई आदिवासी थी सवाल उठता है कि बारहवीं सदी में आदिवासी किसे समझा जाता था? गजेटियर इसका खुलासा नहीं करता। प्रसव के बाद रानी का निधन हो जाता है। दाई उस बच्चे को लेकर ‘विलवन’ गांव गई जो मीरजापुर व चुनार के बीच कहीं स्थित था। विजयपुर के राजा के सहयोग से उस नवजात बच्चे का पालन पोषण शाहाबाद में कहीं कराया जाने लगा जो मृतक रानी के रिश्तेदार थे। वही पुत्रा उड़नदेव जब बालिग हुआ तब उसने कन्तित के तत्कालीन राजा के सहयोग से अगोरी पर हमला किया। (1310) में। उड़नदेव अगोरी जीतने में सफल हो गया तथा बालन्दशाह के वंशज रीवां के मड़वास चले गए जहां वे आजादी के पूर्व तक शासन करते रहे, अब भी वे वहीं आबाद हैं।
विजयगढ़ अगोरी राज का समीकरण यथावत अवाधित ढंग से चलता रहा। घाटम द्वारा चन्देलों को (1290) में पराजित किया जाता है महज बीस साल बाद घाटम को अगोरी की राज व्यवस्था से चन्देलों के वंशज उड़नदेव द्वारा बेदखल कर दिया जाता है। इस प्रकार सन्् (1310) चन्देल व्यवस्था के राज व्यवस्था का पुर्नस्थापन काल बन जाता है। सोनभद्र का अतीत इस प्रकार 1310 से लेकर आजादी के पूर्व काल तक चन्देलों की व्यवस्था पर ही निर्भर था। 1310 से लेकर 1947 ते काल किसी भी एक वंशीय राज्य व्यवस्था के लिए अभूतपूर्व कहा जा सकता है। 437 चार सौ सैतीस साल की चन्देली राज-व्यवस्था का सोनभद्र। भारत के राज-व्यवस्था के इतिहास में कितना महत्वपूर्ण था यह बहस की मांग करता है? एक सार्थक निष्कर्ष निकालने की चेष्टा की जाय तो विजयगढ़ व अगोरी किलों के खण्डहर बताते हैं
कि ये चार पांच सौ साल पूर्व से ही वीरान व खंडहर जैसे पड़े हैं। यहां किसी जीवित
राज-व्यवस्था के चिन्ह अब नहीं दिखते।
विजयगढ़ व अगोरी के पुराने दुर्गाे का खंडहरों में तब्दील होना इतिहास की स्वाभाविक प्रक्रिया के रूप में नहीं लिया जा सकता निश्चित रूप से कारण रहे होंगे। हमें ध्यान रखना होगा कि दुद्धी के बाद झारखंड के पलामू का हिस्सा प्रारंभ होता है। पलामू का राजा चेरो था जिसका नाम अंग्रेजी इतिहासकार ने अज्ञात ही रहने दिया उसे दाउद खां ने अपने अधीन (1661) कर लिया था। इसके पूर्व सन् 1585 से 1616 ई0
में मुसलमानी सेनाओं ने छोटा नागपुर में प्रवेश कर लिया था। मुसलमानी सेनाओं का इन जंगली क्षेत्रों पर ध्यान पन्द्रहवी सदी में जाता है जबकि तेरहवीं सदी से लेकर पन्द्रहवी सदी का भारत-क्रमशः गुलाम वंश 1206-1210 कुतुबुद्दीन ऐबक से लेकर बलवन 1296 तक तथा खिलजी वंश 1296 से लेकर 1316 तक अलाउद्दीन खिलजी का काल तुगलवंश 1325 से लेकर 1414 तक,फिर सैयद व लोदी वंश 1414 से 1526 तक यानि कि बाबर के पूर्व तक। बाबर 1526 से 1530 तक-दिल्ली का अधिपति था। इधर पारीमल व बारीमल का उत्तराधिकारी उड़नदेव अगोरी विजयगढ़ पर अपने पूर्वजों का विजित राज अगोरी, बड़हर, विजयगढ़ फिर अपने अधीन कर लेता है। यहां से अगोरी विजयगढ़ का इतिहास सर्वथा नया रूप ले लेता है।
उधर मीरजापुर का कन्तित राज, गहरवारों के अधीन था ही। कन्तित के राजवंश के बारे में अनुमान है कि वे कन्नौज से आए रहे होगें। शक्तेषगढ़ के कोलों की रिसायत संभवतः तेरहवी शताब्दी में यथावत रही हो, मात्रा भरों का कन्तित से विस्थापन हुआ हो। 1310 में चन्देल वंश के उड़नदेव अगोरी व विजयगढ़ पर काबिज होते हैं तो उधर अलाउद्दीन तब तक गुजरात पर 1299 में रणथंभौर के बहादुर राजा हमीरदेव को 1301 में 1303 में मेवाड़ के चित्तौड़ पर विजय तथा सुविख्यात सुन्दरी रानी पदमावति का जौहर तथा जालौद के राजा पर 1305 में अधिपत्य। समग्र रूप में देखें तो भिन्न-भिन्न ऐतिहासिक परिस्थितियों का भारत कई तरह के वैचारिक परिदृश्यों का सृजन कर रहा था। एक तरफ राजपूतों की पराजय हो रही थी तो दूसरी तरफ अगोरी के विजय अभियानों के लिए खुशियां मनाई जा रही थीं। गुजरात रणथंभौर तथा मेवाड़ का अलाउद्दीन खिलजी से पराजित व ध्वस्त हो जाना यह कहीं न कहीं भारत की केन्द्रीय शक्ति के कमजोर होने की सूचना तो है ही जाहिर है उस समय सत्ता-व्यवस्था के केन्द्र में कुछ ही महत्वपूर्ण रियासतें थीं जिन पर दिल्ली के शासकों द्वारा नियंत्राण स्थापित करने की लगातार कोशिशें की जाती रही हैं।
अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु 1316 में होती है। उसके वाद ‘तुगलक’ वंश की स्थापना मुहम्मद तुगलक 1325 में करता है। अलाउद्दीन खिलजी के बाद दिल्ली की सल्तनत लगातार 1316 से लेकर मुहम्मद तुगलक के सिहासनारूढ़ होने तक अनिश्चितता का शिकार रहती है। कन्नौज, मगध या कि कोशल जैसे शक्तिशाली केन्द्र टूट चुके थे। उधर राजस्थान तथा बुन्देलखण्ड भी छोटी-छोटी रियासतों का केन्द्र बन चुका था। गहरवार वंश के लोग बनारस, कन्तित व विजयपुर तक सिमट चुके थे तथा कालिंजर के चन्देल भी स्वयं को सीमित कर लिये थे। राजपूत शासकों के लिए तेरहवीं सदी से लेकर पूरे चौदहवीं सदी तक का काल शोक पर्व जैसा ही रहा है। कुतुबुद्दीन ऐबक शायद रणथंभौर, कालिंजर, महोबा या बंगाल को कभी न जीत
पाता यदि गुजरात के सोलंकी व दिल्ली के चौहान पृथ्वीराज को मुहम्मद गोरी ने षडयंत्राकारी पराजय न दिया होता। राजपूत शासकों का आपस में युद्धरत रहना भी गोरी के सत्ताशाली होने का कारण बनता है। पथ्वीराज चौहान, चन्देल परमार्दिदेव तथा गुजरात के सोलंकी भीम से भी भयानक युद्ध कर चुके थे, कन्नौज तो उनके लिए वैसे ही दुश्मनी का भाव रखता था।
राजपूती शासन की बची-खुची गरिमा 1527 में समाप्त हो जाती है जब बाबर मेवाड ़शासक राणा सांगा को ‘खानवा’ में पराजित कर देता है। बाबर की मृत्यु 1530 में हो जाती है। हुमायूं बाबर की रणनीति अपनाता है तथा दिल्ली पर आधिपत्य जमाने के सफल,असफल प्रयासों में लग जाता है। हुमायूं के विरोध में एक अफगान नेता शेर खां (शेरश्शाह सूरी) पूरी ताकत के साथ खड़ा होता है तथा उसे शिकस्त भी देता है। शेरश्शाह 1540 में कन्नौज जीत लेता है तथा हुमायुं को लज्जापूर्ण हार झेलनी पड़ती है। इसके पूर्व इतिहास बताता है कि दिल्ली सुल्तान सिकन्दर लोदी चुनार विजय का अभियान 1493 में बना चुका था जिसे जौनपुर के शर्की-शासकों ने मुंह मोड़ने के लिए विवश कर दिया था। उस समय तक ‘कन्तित’,पन्ना रियासत के अधीन था तब पन्ना एक स्वतंत्रा शासन-सत्ता की हैसियत हासिल कर चुका था।
ऐसा नहीं था कि सल्तनत का संघर्ष राजपूतों से ही चल रहा था कहीं न कहीं दोस्ती भी थी। सल्तनत के लिए कुछ स्वतंत्रा शासकों से दोस्ती तथा कुछ शासकों से दुश्मनी अनिवार्य थी। अनिवार्य इसलिए कि कोई सत्ता प्रतिष्ठान दिल्ली तक न पहुॅच जाये। शर्की शासकों में दिल्ली तक की पहुॅच क्षमता प्रत्यक्ष रूप से दिख रही थी सो दिल्ली सल्तनत का सिकन्दर लोदी, शर्की शासकों को पद्च्चुत करने की चिन्ता में था। सिकन्दर लोदी ने इस कार्य के लिए रीवां के शासक भेदचन्द्र का उपयोग किया था तथा कन्तित रींवा को दे दिया। उस समय रींवा का राज्य कन्तित से लेकर गया तक विस्तारित हो चुका था। 1495 तक भेदचन्द्र तथा उनके राजकुमार पुत्रा की मृत्यु हो गई फिर सिकन्दर का प्रभुत्व क्षेत्रा उस तरफ भी बढ़ गया।
जौनपुर के शर्की शासक चुनार पर अपना अधिपत्य बनाए हुए थे तथा सिकन्दर लोदी चुनार फतेह के लिए विभिन्न योजनायें बना रहा था जैसे सालिवाहनों से समझौता आदि। सालिवाहनों से सिकन्दर लोदी का समझौता हुआ तथा शर्की शासक हुसैनशाह पराजित हुआ। हुसैनशाह के बाद इतिहास से शर्की वंश फिर विलुप्त हो गया। इतिहास की युद्ध-कालीन संस्कृतिमें भीे सोनभद्र की विजयगढ़ अगोरी रियासतें चैन की वंशी बजा रहीं थीं।
बाबर काल में बंगाल तथा बिहार का पूर्वी क्षेत्रा अफगानों के अधीन था। हालांकि बाबर महज चार साल तक ही भारतीय इतिहास को प्रभावित कर पाया था पर अगोरी के बाद वह पहला मुगल शासक था जिसने राजपूतों को अपना प्रमुख लक्ष्य बनाया था तथा उन्हंे पराजित भी किया था। बाबर का ऐतिहासिक काल कटूनीति व युद्ध-तक्नोलाजी के उपयोग का काल भी था। पहले के किसी युद्ध में ऐसी सूचना
नहीं मिलती कि तोपों व बन्दूकों का उपयोग किया गया हो पर बाबर काल में इसकी सूचना प्राप्त होती है। उसकी सेना मंे तोपची व बन्दूकची दोनों थे। बाबर दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी को पराजित कर देता है फिर राणा सांगा को कोई सहयोग नहीं देता फलस्वरूप राणा सांगा बाबर से रवानवा में लड़ते हैं तथा पराजित हो जाते हैं। राणा सांगा की पराजय तथा दिल्ली की सल्तनत पर बाबर की उपस्थिति इतिहास की विपरीत धारा की सूचना देती है कि सल्तनत का भारतीय राज-व्यवस्था के विभिन्न इकाइयों से कोई राष्ट्रवादी रिश्ता न बनता था उस समय राष्ट्र की सोच काफी सीमित तथा लक्ष्यहीन थी।
23 मार्च 1529 को बाबर चुनार तक आता है, उसका लक्ष्य होता है अफगानों का सफाया करना। बाबर द्वारा अफगानों के सफाये की नीति 1526 से लेकर 1556 यानि कि अकबर के सत्तारूढ़ होने के 30 वर्ष तक लगातार जारी रही थी। इसी बीच शेरश्शाह सूरी विजेताओं तथा शाहों की सुनहरी सूची में अपना हस्तक्षेप करता है तथा 1540 से लेकर 1555 तक हुमायूं की सारी संभावनायें समाप्त कर देता है। वह हुमायूं को 1539 के चौसा युद्ध में पराजित करता है तथा कालिंजर के राजा कीरत सिंह को 1545 में हराता है। यहां यह ध्यान रखना होगा कि 1203 में चन्देल राजा परमादिैदेव का पतन हो जाता है तो 1545 में चन्देल राजा कीरत सिंह का। 342 साल तक कालिंजर की राजव्यवस्था स्थिर रहती है। चन्देल वंश के ही उड़नदेव की व्यवस्था विजयगढ़ व अगोरी पर भी कायम रहती है। सोनभद्र दिल्ली तथा शर्की की भिन्न-भिन्न व्यवस्थाओं में लगातार उलझा रहा तो कभी पूरी तरह निरंकुश व स्वतंत्रा भी रहा था। स्वतंत्रा राज्यों के अधिपतियों की तरह विजयगढ़ व अगोरी राज पर चन्देल वंशजों का आधिपत्य बिना किसी अवरोध व व्यवधान के स्थापित रहा था।
सोनभद्र तथा मीरजापुर के रजवाड़ों को एक साथ जोड़कर इतिहास का अवलोकन करने से यह निष्कर्ष निकालना गलत न होगा कि कन्तित, विजयपुर तथा शक्तेषगढ़ राज से कोलों व भरों का विस्थापित हो जाना तथा विजयगढ़ व अगोरी राज से खैरवाह (खरवाह) वंश के राजा घाटम का विस्थापित हो जाना ही वह प्रमुख कारण था जिससे इन रिसायतों के प्रभुत्व पर किसी तरह का विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता। दिल्ली की सल्तनत झंझावतों में फंसी रहती है सो यहॉ पर किसी तरह का संकट नहीं होता कि ये रियासतें किसके अफगान तुर्क या कि मुगल किसके अधीन रहें? सोनभद्र तथा मीरजापुर के रजवाड़े क्रमशः चन्देल व गहरवार राजवंश का प्रतिनिधित्व करते थे तथा इन्हें राज्य-व्यवस्थओं के उत्थान-पतन की जानकारियां थीं सो ये आपस मंे सत्ता व्यवस्था की सुलह वाली समझदारी के साथ अपने-अपने प्रभुत्व क्षेत्रों पर जमे रहना तथा किसी भी तरह के अन्तरविरोधों से बच कर रहना अनिवार्य मानते थे। हालांकि कन्तित के बाहर भदोही में मौनस राजपूत स्वतंत्रा होने के लिए छट-पटा रहे थे। शक्त सिंह जो गहरवार मूल का था जिसने अपने नाम पर शक्तेषगढ़ किले का निर्माण कराया तथा वहां के कोलों को पराजित किया उसने मौनसों की लड़की स अपना विवाह करके अविवादित सन्तुलन स्थापित कर लिया। शक्तसिंह अकबर का समकालीन था तथा 1556 से लेकर 1605 तक उसने शासन किया एक लम्बा शासन काल 49 साल तक का। उस समय अगोरी, विजयगढ़ राज के लिए किसी प्रकार की बाधा न थी। रींवां का राज्य भेदचन्द्र के निधन के बाद साम्राज्यवादी विस्तार योजना के लिए सक्षम न था सो रींवा की तरफ से भी विजयगढ़ अगोरी राज के लिए खतरा न था। पलामू का राजा चेरो था जिसके तरफ से हमलों की किसी भी तरह की कोई आशंका न थी। पलामू का राजा अफगानों तथा मुस्लिमों के हमलों से डर रहा था, क्योंकि छोटा नागपुर की तरफ से वे कभी भी पलामू पर धावा बोल सकते थे। सासाराम की तरफ से शेरशाह पलामू तक आ सकता था। सो वह पड़ोसी राज अगोरी, बड़हर से दुश्मनी खरीदना नहीं चाहता था। चन्देल वंश के अन्तिम राजा केशव सरन की मृत्यु 1871 में होती है केशव सरन की मृत्यु के बाद रानी बेदशरण कुंअरि के जिम्मे शासन व्यवस्था आ जाती है। रानी की मृत्यु के बाद शासन की बागडोर चन्देल वंश के बाबू जमगांव (अगोरी राज के परिजन) के अधीन हो जाती है।
अगोरी बड़हर राज का समीकरण लगातार पन्द्रहवी सदी तक चलता रहा था। पन्द्रहवी सदी में एक वेन वंशी राजपूत सिंगरौली में अगोरी राज-व्यवस्था से बगावत कर देता है तथा खुद को स्वतंत्रा घोषित कर देता है। तत्कालीन राजपूत वंश परंपरा में उसे हीन समझा जाता था लेकिन स्थिति तब पलटती है जब उसकी शादी रायपुर के प्रमुख राजपूतवंश में हो जाती है। रायपुर म.प्र. में पड़ता था। उस बागी वेन वंशी राजपूत का दमन अगोरी, बड़हर तथा बर्दी के संयुक्त प्रयासों से 1550 में हो जाता है पर वह चुप नहीं बैठता उसके वंश के दरियाव व दलेल दोनों भाई मिल कर पुनः सिगरौली जीत लेते हैं तथा उसके शासक बना जाते हैं। दरियाव तथा दलेल दोनांे आपसी सहमति से सिंगरौली को दो भागों में बांट लेते हैं। दलेल को सिंगरौली का वह भाग मिला जो रींवां से जुड़ता था तथा दरियाव को सोनभद्र से जुड़ने वाला भाग मिला। बाद में चल कर दरियाव, अपने भाई दलेल की हत्या कर देता है तथा खुद पूरे सिंगरौली का अधिपति बन जाता है। दरियाव के ही वंश का फकीरशाह 1700 में अपना राज तिलक करवाता है तथा राज मुकुट धारण करता है। सिंगरौली का शाहपुरा सिंगरौली राज का नाम-करण भी फकीरशाह के काल ही में होता है। उधर कन्तित का परिक्षेत्रा भी मौनस राजपूतों के विद्रोह का क्षेत्रा बना रहता है। सत्राहवीं सदी इस प्रकार से सोनभद्र व मीरजापुर के लिए अस्थिरता की सदी रही है। दन्त कथाओं के अनुसार दलेल व दरियाव दोनों पलामू के चेरो राजा से जुड़े हुए थे तथा वे खरवार मूल के थे। चेरो व खरवार समूह ने आपस में मिलकर पन्द्रहवीं सदी में अगोरी बड़हर राज से विद्रोह कर दिया था उस विद्रोह का नेतृत्व दरियाव व दलेल ने किया था। खरवार राज वंश के लोग खुद को बेनवंशी राजपूत मानते हैं हालांकि इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता। खरवार जाति समूह के लोग वैसे आदिम वंश की किसी शाखा जैसे जान पड़ते हैं। जिसके अनुसार विजयगढ़ दुर्ग का निर्माण असुर
शक्तियों ने कराया था तथा दूसरी कथा गजेटियर शेरशाह से जोड़ता है एवं स्थापित करता है कि शेरशाह का संबंध इस किले से था इस किले में कोई सुरंग थी जो रोहताशगढ़ बिहार से जुड़ती थी। अब उस सुरंग का कोई चिन्ह वहां नहीं दिखता। दन्त-कथा है कि शेरशाह के ही समय में ‘मीरानशाह’ नाम के एक अफगान सन्त बिजयगढ़ किले पर आये थे तथा यहीं से इस्लाम का प्रचार कर रहे थे। उन्हीं अफगान सन्त की मजार यहां पर स्थित है। शेरशाह के पूर्व यह किला चन्देलों के ही अधिपत्य में था तथा उसके पहले बालन्दशाह के वंशजों के अधीन था। शेरशाह के पराभव के बाद यह दुर्ग फिर चन्देलों के अधीन आ गया तथा तब तक रहा जब तक बनारस के राजा बलवन्त सिंह ने चन्देलों को यहां से विस्थापित नहीं कर दिया।
सोनभद्र का दुद्धी परिक्षेत्रा अपने अतीत में जिस प्रकार भिन्न था, उसी प्रकार आज भी है। बनारस के इतिहास के आधार पर देखा जाये तो शायद सोनभद्र का विस्तार पूर्व में ‘नगर राज’ जनपद गढ़वा तक था या यह भी संभव है कि बंगाल व बिहार का हिस्सा विन्ढमगंज, म्योरपुर तक भी रहा हो। भाषाई व बोली के पहचानों के आधार पर तो यह जान पड़ता है कि दुद्धी के परिक्षेत्रा, ‘नगर राज’ या अम्बिकापुर राज के काफी करीब थे। डा0 मोती चन्द का मानना है कि दुद्धी का परिक्षेत्रा भुइयां आदिवासी समूहों के अधीन था तथा वह समूह ही खेती व जमीनदारीं से जुड़ा था। कालान्तर में उन समूहों में जागरूकता आई फलस्वरूप उनका आर्यीकरण प्रारंभ हुआ। आर्यीकरण ने उन्हें सामन्त तथा राजा भी बनाया। इस क्षेत्रा की भौगोलिक व सांस्कृतिक परिस्थितियां आज भी एक पोख्ता संकेत की तरह हैं। दुद्धी का पूरा परिक्षेत्रा रीवां के बघेलों, सरगुजा के रक्सेलों, सिगरौली के बेनवंशियों रक्सेलों के रिश्तेदार तथा अगोरी, विजयगढ़ के चन्देलों के संपर्क में रहा होगा तथा इन राजपूत राजाओं ने भुइयां के सरदारों का आर्यीकरण करके राजा की मान्यता प्रदान किया होगा। अंग्र्रेजी प्रभुत्व काल में दुद्धी परिक्षेत्रा को रानी विक्टोरियां राज में परिवर्तित कर दिया गया था जिसका नियंत्राण मीरजापुर के कलक्टर के अधीन रहता था तथा कलक्टर उस क्षेत्रा मंे बतौर सामन्त राजा प्रवेश करता था।
बारहवीं सदी के उत्तरार्ध से लेकर सत्राहवीं सदी के अन्त लगभग पांच सौ साल तक सोनभद्र जनपद, मीरजापुर के साथ भिन्न-भिन्न तुर्क, तुगलक,खिलजी तथा मुगल साम्राज्यवादियों की रणनीति व दमन का हिस्सा बना हुआ था। इतिहास की सारी कथाएं सम्राटों तथा राजाओं व जमीनदारों की लड़ाईयों के अर्न्तविरोधों, झगड़ों, दुश्मनियों, दुश्चक्रों का गायन करती रहीं तथा उपदेशित भी कि इतिहास कभी भी शासकों के सुरक्षित ऐश-श्गाहों से बाहर नहीं निकल सकता। इतिहास राजाओं, महाराजाओं को ऐतिहासिक पात्रा बनाने का महज लिखित दस्तावेज हुआ करता है फलस्वरूप पूरे देश की वास्तविक कथाओं का ही जब विलोपन हो गया तब सोनभद्र में कौन सी ऐसी कथा होती जिसका जिक्र इतिहासकार या गजेटियर करते। स्थानीय जन-संघर्षों का होना वर्तमान को जीवित रखने तथा इतिहास बनने के लिए अनिवार्य है। सोनभद्र के अतीत में सिर्फ राजाओं का संघर्ष दिखता है वह भी सिर्फ दो तीन बार पहली बार, मदन शाह के पतन के समय दूसरी बार चन्देल राज के पतन के समय तथा तीसरी बार खैरवाह राजा घाटम के पतन के समय। एक बार और 1550 जब अगोरी विजयगढ़ तथा वर्दी के राजा गण मिल कर सिगरौली के स्वयंभू बेन वंशी राजा को विस्थापित कर देते हैं। 1550 के बाद फिर पूरे सोनभद्र में किसी भी तरह का परिवर्तन नहीं दिखता। सत्राहवी सदी तक यह क्षेत्रा इतिहास के मौन कथा का हिस्सा बन जाता है। इस सन्दर्भ मंे ध्यान रखना होगा कि दिल्ली अस्थिर थी, कोई मजबूत शासन व्यवस्था न थी। यवन शासक 1206 से लेकर 1526 तक दिल्ली पर काबिज रहते हैं लगभग 320 साल तक पर वे सदा अपनी सुरक्षा व गद्दी बचाने की चिन्ता में ही परेशान थे। भवनों, किलों के निर्माण के अलावा उनके पास कोई दूसरा काम न था, जिससे कि तीन सौ वर्र्षो को इतिहास में स्मृति के तौर पर याद किया जाता। देश की सारी उर्जा का दोहन मस्जिद तथा किलों के निर्माण में नष्ट कर रहे थे। आज केवल शेरशाह सूरी याद किया जाता है जो जी.टी. रोड का निर्माता था जिसने रोड के किनारे वृक्ष, धर्मशाला व कूओं का निर्माण कराया था। मध्यकाल की सांस्कृतिक चेतना का स्वरूप पूरी तरह सामन्ती व अभिजात्य था। संगीत, कला, साहित्य,परंपरा सबमें अभिजात संस्कृति का बोल-बाला था। गीत, संगीत व नृत्य को ऐश्य्यासी का साधन बना दिया गया था तथा साहित्य भी वैसा ही जो राजाओं की स्तुति करें। इसके बावजूद उसी काल में भक्ति-आन्दोलन जोर पकड़ता है। अकबर के काल में रामचरित मानस की रचना हो चुकी रहती है कबीर, नानक को उनके सुधार वादी कार्यो के लिए आम जन में प्रतिष्ठा मिल चुकी थी। भक्ति-रस के कवियों के साथ-साथ सूफी सन्तों का हस्तक्षेप भी उस काल की महत्वपूर्ण उपलब्धियां हैं।
मुगल काल 1526 से प्रारंभ होता है जो अंग्रेजों आने तक भिन्न-भिन्न रूपों तथा विसंगतियों के साथ चलता रहता है। बाबर से लेकर अकबर द्वितीय तक यानि 1764 लगभग 238 साल तक मुगल काल कभी बहुत ही खूबसूरत दिखता है तो कभी इतना बदसूरत कि समझना मुश्किल। क्या शासकों की ऐसी ही नस्ल हुआ करती थी? शाहजहां बेटे के द्वारा ही गिरफ्तार किया जाता है तो कोई भाई के द्वारा परास्त किया जाता है। सम्राट के वंश का हर छोटा बड़ा शासन की बागडोर अपने अधीन करनेे के लिए लालायित रहता है। अकबर दिल्ली पर 49 साल तक शासन करता है तो औरंगजेब भी 49 साल तक। इतिहास में औरंगजेब को किन्हीं कारणों से इतिहास का खलनायक दिखाया जाता है जब कि अकबर को इतिहास का नायक। वह जमे-जमाये राजपूती वैभवों, युद्धों की उन्मादी कथाओं का अन्त करता है। सबसे पहले हेमू को हराकर अकबर दिल्ली पर काबिज होता है फिर राजपूतों के अर्थहीन अभिमानों को पराजित करता है। ग्वालियर, अजमेर, जौनपुर, मालवा, गोंडावाना, मेवाड, बीकानेर, जोधपुर, जैसलमेर के महत्वाकांक्षी सत्ता-प्रतिष्ठानों को इस तरह धूल-धूसरित करता है कि सिवाय मुगल सत्ता-प्रतिष्ठान में विलयित होने के उनके पास कुछ शेष नहीं रहता। कोई उनमें ऐसा नहीं था जो महाराजा राणा प्रताप या अमर सिंह की नकल करता और पराजय को भी गरिमापूर्ण बनाता। ऐसा ही कुछ औरंगजेब के ऐतिहासिक पात्रा के साथ घटित होता है। वह भी मारवाड़ के अमरसिंह, बुन्देल खंड के छत्रासाल तथा मराठा के शिवाजी को निशाना बनाता है। विपरीत परिस्थितयों में भी शिवाजी 1674 में मराठा को स्वतंत्रा राज्य स्थापित कर ही लेते हैं। औरंगजेब तथा अकबर दोनों इतिहास की युद्धोन्मादी गति-विधियों के नियन्ता के रूप में पन्द्रहवीं से लेकर सत्राहवीं सदी तक इतिहास के आवश्यक विषय बने रहते हैं तो उनके पूर्व अलाउद्दीन खिलजी बारहवीं सदी के अन्त से लेकर तेरहवीं सदी के प्रारंभ तक युद्धों की ध्वंसात्मक रणनीति बनाने में जुटा हुआ होता है। अलाउद्दीन के युद्धों की परणति मंगोलांे के दमन के साथ-साथ गुजरात, रणथंभौर, मेवाड़ तथा जालौर के पराजय में बदलती है। साफ-साफ देखा जा सकता है कि तेरहवीं सदी के राजपूत शासक सत्राहवीं सदी तक किसी ठोस, समन्वयवादी रणनीति का सहारा नहीं लेते हैं। अलाउद्दीन, अकबर तथा औरंगजेब राजपूतों की आपसी फूट का फायदा उठाते हैं तथा जमेजमाये राजपूत शासकों को पराजित करते हैं। अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु के बाद ही तुगलक वंश, शर्की वंश तथा शेर शाह सूरी का अभ्युदय होता है जो बाबर से होते हुए हुमायूं तथा अकबर तक समाप्त हो जाता है।
सोनभद्र में चन्देल राज-वंश स्थापित हो जाते हैं तो रींवा में बघेल राज-वंश, कन्तित में गहरवार राज-वंश, नगर (गढ़वा) में भुइयां (परिवर्तत राजपूत सूर्यवंशी) सिंगरौली में बेन वंशी, अम्बिकापुर में रक्सेल स्थापित हो जाते हैं जिनका रिश्ता बहुत दूर तक भी दिल्ली से नहीं जुड पा़ता। इन राजवंशों के लिए कभी भी दिल्ली अभिष्ट नहीं रहती न हीं दिल्ली वालों के लिए सोनभद्र उनके लक्ष्य में रहता है। अगर चेत सिंह राजा बनारस पलायन करके विजयगढ़ दुर्ग में शरण नहीं लिए होते तथा विजयगढ़ दुर्ग को अपना खजाना नहीं बनाए होते तो शायद वारेन हेस्टिंग्स, चेतसिंह को पकड़ने व पराजित करने के लिए लतीफपुर, पपिहटा से भागता हुआ विजयगढ़ किले तक नहीं आता। तुर्क, मुसलमान, अफगान तथा अंग्रेजों के लिए चुनार का किला सबसे महत्वपूर्ण था। वहां हुमायूं पहुंचता है तो अकबर भी, शेरशाह ने तो उसे अपना सत्ता केन्द्र ही बना लिया था। अशोक के समय वह किला शिलालेखों के निर्माण का केन्द्र ही बना हुआ था। इस प्रकार हम पाते हैं कि चुनार का किला सदैव इतिहास के लिए अनिवार्य बना रहा था।
मध्यकाल का पूरा इतिहास; भारत के बड़े-बड़े शासकों के दमन तथा केन्द्रीय
सत्ता-प्रतिश्ठान की स्थापना का रहा है क्योंकि दिल्ली स्थिर नहीं रह पाती थी। दिल्ली पर स्थापित शासकों की स्थापना तत्कालीन संप्रभुओं या किस्म-किस्म के क्षेत्राीय सत्ता-प्रतिष्ठानों पर निर्भर रहा करती थी इसलिए अलाउद्दीन खिलजी से लेकर अकबर तथा औरंगजेब तक की दिल्ली की स्थिरता तभी तक बनी रह सकी थी जब तक क्षेत्राीय सत्ता-प्रतिष्ठान आपस में लड़-लड़कर दिल्ली की मोहताजगी को निमंत्रित करते रहे थे। कमोवेश यही हाल मुहम्मद गोरी के सत्ता-प्रतिष्ठान का भी था वह भी सबसे पहले मुल्तानों पर फिर गुजरात के सोलंकियों पर, फिर पृथ्वीराज चौहान पर तथा कन्नौज पर हमला करता है। पृथ्वीराज से दिल्ली छीन लेना आसान नहीं था। यदि पृथ्वीराज के संबंध सोलंकी (गुजरात) गहरवार (कन्नौज) चन्देल (कालिंजर) से कम से कम दोस्ताना होते। क्षेत्राीय सत्ता प्रतिष्ठानों में सहयोग सुलह तथा आपसी समझदारी या सहमति के बिन्दुओं पर एक राय जैसी मनोवैज्ञानिक रणनीति कत्तई नहीं थी। युद्धोन्माद तथा युद्ध-जनित बनावटी गरिमा के जनक क्षेत्राीय सत्ता-प्रतिष्ठान एक तरह से तानाशाही के दुर्गुणों से मदान्ध थे। दिल्ली दिखती पास थी, पर थी बहुत दूर, इतना दूर कि सोनभद्र दिल्ली के हमलों से पूरी तरह से अप्रभावित रहता है। सोनभद्र पर मात्रा कन्तित व चुनार का तो कन्तित पर दिल्ली के शासकों तथा अवध के नवाबों व जौनपुर के अधिपतियों का प्रभाव पड़ता था, सो यहां की व्यवस्था कन्तित की राज-व्यवस्थाकी तरह ही चलती रही थी।
आज का सोनभद्र भी दिल्ली व लखनऊ जैसे सत्ता केन्द्रांे से काफी दूर है। यहां कलक्टर के रूप में एक ऐसा शासक पद स्थापित है जिसका प्रमुख कार्य होता है सोनभद्र से राजस्व का संग्रह करना तथा अधिकतम राजस्व इकट्ठा करना। राजस्व संकलन के कार्य को गरिमा प्रदान करने के लिए कलक्टर के जिम्मे शान्ति-व्यवस्था ;स्ंू ंदक व्तकमतद्ध स्थापित करने जैसा भी कार्य होता है। नया जनपद सृजित होने के बाद से आज तक ऐसा कुछ भी प्रमाण नहीं मिलता कि यहां के माननीय सांसदों या विधायकों ने दिल्ली या लखनऊ की सत्ता को कभी विचलित भी किया हो। वहां की सत्ताओं को हिलाने-डुलाने की क्षमता रखना तो दूर की बात है। इस प्रकार सोनभद्र आज भी समंुद्री टापू की तरह उदास व अनाथ भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में दिखता है जिसकी अपनी कोई अवाज नहीं। मध्यकाल से लेकर आज तक सोनभद्र की इस दयनीय स्थिति के ठीक विपरीत यहां के औद्योगिक आर्थिक सत्ता-प्रतिष्ठानों की है। यहां के बिजली व अल्मुनियम के औघोगिक प्रतिष्ठान अर्थ विपणन, नियोजन, प्रबन्धन व मुनाफे में दुनिया स्तर के हैं लेकिन इनका दूसरा स्वरूप पर्यावरण श्रम-सुरक्षा, श्रम-प्रोत्साहन, श्रम-कल्याण इतने शर्मनाक हैं कि कल्याणकारी राज-व्यवस्था पर दाग की तरह हैं। जाहिर है इसके अनेक कारण हैं। श्रम-शक्ति का असंगठित होना तथा श्रम-कानूनों का श्रम-शक्ति के हितों के खिलाफ होना। भारी औद्योगीकरण, भारी मशीनरीकरण का वैज्ञानिक रूप होता है। भारी-मशीनीकरण एक ऐसा श्रम नियोजन है जो मानव-श्रम की उपयोगिता को न केवल क्षतिग्रस्त करता है वरन् अपमानित भी करता है। सोनभद्र को अपमान झेलना उसकी किस्मत में ही लिखा हुआ है शायद। सोनभद्र का आर्थिक अध्ययन इस तथ्य को प्रमाणित कर सकता है कि यहां की बेरोजगारी व गरीबी प्रायोजित है। श्रम-कानून तथा भारी मशीनों की आमद ने यहां लाखों मनुष्यों के रोजगार के अवसर को छीन लिया है। अब यह तथ्य अज्ञात नहीं है। सोनभद्र की भौगोलिक तथा सामाजिक जटिलाएं एवं अर्न्तविरोध तो बहुत कमजोर कारण हैं हालांकि इनके कष्ट-कर प्रभावों से भी सोनभद्र काफी क्षतिग्रस्त हुआ है।
मध्यकाल जैसा कि कहा जा चुका है कि युद्धों व हमलों का काल रहा है। पन्द्रहवीं सदी में यहां भी वेनवंशी राजपूतों व चन्देलों में विनाशकारी युद्ध होता है, हालंकि उस युद्ध का विवरण नहीं मिलता, कितने हाथी, घोड़े तथा सैनिक हता-हत हुए। इतिहास में प्रमुख रूप से सिकन्दर जैसे विदेशियों का आक्रमण उल्लिखित हैं जो साफ तौर से राजपूत सत्ता-प्रतिष्ठानों की कमजोरियों व अर्न्तविरोधी को स्पष्ट करते हैं। मुहम्मद बिन कासिम का आक्रमण के बाद लगभग पांच सौ साल तक भारत हमले से सुरक्षित रहता है। 1000-1026 आते-आते महमूद गजनवी का हमला सीधे राजपूती सत्ता केन्द्रों पर होता है फिर तो विदेशियों के हमलों की बाढ़ आ जाती है। मुहम्मद गोरी, चंगेज खॉ, तैमूर लंग के हमले धारावाहिक रूप से होते हैं। 1176 से 1398 तक भारत विदेशी हमलों को झेलता रहा है। चौदहवीं सदी के बाद से विनाशकारी हमलों का सिलसिलां रुकता है फिर पुर्तगालियों व अंग्रेजों के हमले जहांगीर के सत्ता नशीन होने के बाद प्रारंभ हो जाते हैं। बाद में ईस्ट इण्डिया कम्पनी, यूनियन जैक के अधीन होकर भारत में ब्रिटिश-शासन का दरवाजा खोल देती है। सत्राहवीं सदी में दिल्ली का राजनीतिक परिदृश्य बदलता है तथा मुहम्मदशाह वहां सम्राट बन जाता है। मुहम्मदशाह बनारस, जौनपुर व गाजीपुर की जागीरें मुर्तजा खान को दे देता है। यहीं से सोनभद्र, कन्तित, चुनार तथा बनारस की राजनीतिक गतिविधियां एक नये सत्ता-प्रतिष्ठान के अभ्युदय की तरफ बढ़ती हैं। बनारस की मुकम्मल व्यवस्था के लिए अवध के नवाब तथा दिल्ली के सम्राट दोनों चिन्तित रहते हैं। फलस्वरूप वे रूस्तमअली खान के जिम्मे बनारस को लगा देते हैं। राजस्व के लेन-देन की गड़बड़ी के कारण रूस्तमअली को मुर्तजा खान विस्थापित कर देता है। रूस्तम खान को यह जागीर पांच लाख वार्षिक पर मिली थी। सादत खान 1728 मंे अवध का सूबेदार भी रहा चुका था। इसलिए उसकी विश्वसीनयता असंदिग्ध थी। सादत खान शासकीय कूटनीति का सहारा लेता है तथा जागीर को रूस्तम अली के अधीन इस शर्त पर सुपुर्द कर देता है कि रूस्तम अली सबसे पहले पांच लाख मुर्तजा खान को चुका दे फिर आठ लाख सालाना सादत खान को नियमित रूप से अदा करता रहे।
रूस्तम अली राजस्व का भुगतान सादत खान को नहीं कर पाता है। सादत खान
रूस्तम अली से असंतुष्ट हो जाता है इस स्थिति में मुकाबिला करने की हिम्मत रूस्तम अली में नहीं होती सो वह अपने सहायक बनारस के भुइहार गौतम ब्राहमण मनसा राम को अधिकृत करता है कि वह सादत खान व नवाब से सुलह का रास्ता निकाले। मनसा राम को कूटनीति व षडयंत्रा करने का अच्छा अवसर मिलता है 1738 में मनसा राम अपने पुत्रा बलवन्त सिंह के नाम से बनारस व चुनार की जागीरें प्राप्त करने में सफल हो जाता है।
1738 से लेकर वारेन हेस्टिंग्स की सेना के द्वारा विजयगढ़ पर आक्रमण में करने के पूर्व तक सोनभद्र बनारस सत्ता केन्द्र का एक हिस्सा बना रहता है। 1781 के बाद 1811 में चेत सिंह राजा बनारस की मृत्यु हो जाती है। इस दौरान अंग्रेजों द्वारा विजयगढ़ व अगोरी के शासकों को पुनः स्थापित कर दिया जाता है। 1700 में सिंगरौली राज की स्थापना फकीरशाह कर चुका होता है। बाद में अंग्रेजों द्वारा उसे भी मान्यता मिल जाती है। सोनभद्र की ऐतिहासिक गतिविधियों को स्पष्ट करने के लिए आवश्यक होगा कि बनारस के राजा बलवन्त सिंह तथा चेत सिंह के ऐतिहासिक काल को स्पष्ट रूप से जाना जाये। मुगलों, तुर्को अफगानों से अलग हटकर हिन्दू अधिपति राजा बनारस की नीतियों गतिविधियों एवं राजनीतिक हस्तक्षेपों का केन्द्र सोनभद्र बन जाता है। बलवन्त सिंह इतिहास के स्वनिर्मित पात्रा होते हैं तथा उन्हें पारंपरिक शासक होने की मर्यादा भी प्राप्त नहीं होतीं ऐसी स्थिति में बलवन्त सिंह अपनी ऐतिहासिक अनिवार्यता स्थापित करने के लिए भूमि-व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन करते हैं तथा ऐसे लोगों को भूमि-प्रबंधन एवं राजस्व संग्रह में नियोजित करते हैं जो उनके प्रति घाृणित दर्जे तक आज्ञाकारी बने रह सकें। इस प्रकार से सोनभद्र में बलवंत सिंह द्वारा चलाये गये भूमि-प्रबन्धन का अभूतपूर्व दौर प्रारंभ होता है जो कमोवेश चेत सिंह तक चलता रहता है। बलवन्त सिंह की भूमि-व्यवस्था व राजस्व संग्रह के तौर-तरीकों का अगोरी विजयगढ़ एवं सिंगरौली राज द्वारा कोई विरोध नहीं होता। पारंपरिक रूप से चली आ रही शासन व्यवस्था सोनभद्र में चलती रहती है यानि आधे से अधिक भू-भाग पर चन्देल राज व्यवस्था चल रही थी तो शेष सोनभद्र यानि अनपारा, सिंगरौली परिक्षेत्रा पर बेनवंशी राज-व्यवस्था। राजस्व संग्रह व नियमन के लिए बनारसी राज-व्यवस्था की नकल यहां प्रभावी थी। कुल मिला कर सोनभद्र का ऐतिहासिक मध्य-काल युद्धकालीन परंपराओं से अलग नहीं था। उस दौर में ही आदिवासियों के सत्ता-प्रबंधन की लोक-परंपरा, वन सभ्यता, राज-प्रणाली, उनकी रियासतों के उन्मूलन के साथ समाप्त कर दिया गया था। तथा आर्य-संस्कृति से प्रभावित नये किस्म की सर्वथा नई सत्ता-संस्कृति उग चुकी थी। यहां के आदिवासी तथा उनकी प्रकृतिमूलक संस्कृति जो वन सभ्यता और संस्कृति से जुड़ी हुई थी मिटाई जा चुकी थी।
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